
सूर्योदय भारत समाचार सेवा, चित्रकूट : महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, रानी दुर्गावती शोध संस्थान तथा इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में वीरांगना रानी दुर्गावती की जयंती के अवसर पर एक भव्य वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ रानी दुर्गावती की प्रतिमा पर भावपूर्ण पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया।
मुगलों के खिलाफ युद्ध और गुरिल्ला पद्धति पर चर्चा
संगोष्ठी के प्रारंभ में प्रो. जयशंकर मिश्र ने विषय प्रवेश कराते हुए रानी दुर्गावती को ‘आदिवासियों की रानी’ के रूप में रेखांकित किया और आक्रांताओं के खिलाफ उनके संघर्षों को याद किया। इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. त्रिभुवन सिंह ने ‘आईने अकबरी’ का विधिक संदर्भ देते हुए बताया कि रानी दुर्गावती की ‘गुरिल्ला युद्ध पद्धति’ को आगे चलकर महाराजा छत्रसाल और छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी अपनाया था। प्रो. ललित कुमार सिंह ने रानी दुर्गावती को भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बताते हुए पूर्वजों की विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
अबुल फजल ने माना ‘सर्वोत्तम रानी’, संस्मरण हुए साझा
कार्यक्रम में प्रो. प्रसन्न पाटकर ने रानी दुर्गावती की उस ऐतिहासिक प्रतिमा निर्माण से जुड़े संस्मरण साझा किए जिसे उनके पिता ने तैयार किया था। प्रो. कमलेश थापक ने हमीरपुर के सरवई गांव का जिक्र करते हुए अकबर के आक्रमण के दौरान राज्य व प्रजा की रक्षा में रानी के महान त्याग पर प्रकाश डाला।

अपने मुख्य अध्यक्षीय व्याख्यान में कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. कपिल देव मिश्र ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और सामाजिक समरसता पर बात की । उन्होंने इतिहासकार अबुल फजल का उल्लेख करते हुए कहा कि वह भी रानी दुर्गावती को ‘सर्वोत्तम रानी’ मानता था। उन्होंने छात्रों को चरित्रवान और श्रमशील बनने का प्रेरक संदेश दिया। इस दौरान डॉ. कन्हैयालाल मिश्र ने मंच का कुशल संचालन किया। समारोह में डॉ. राकेश, डॉ. सिद्धार्थ सहित विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मुस्तैदी से उपस्थित रहे।
