
सूर्योदय भारत समाचार सेवा, चित्रकूट : अयोध्या के बहुमुखी कायाकल्प से प्रेरित होकर मध्य प्रदेश सरकार और भाजपा द्वारा चित्रकूट के विकास के लिए किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इसका मॉडल अयोध्या से अलग होना चाहिए । त्रेतायुग में अयोध्या जहाँ एक भव्य राजधानी थी, वहीं चित्रकूट प्रभु श्रीराम की वनवासी तपोभूमि रही है । इसलिए, चित्रकूट की पहचान उसकी प्रकृति, ग्रामीण सादगी और सीधे-सहज जीवन में ही सुरक्षित रह सकती है ।
चित्रकूट में बढ़ते शहरीकरण के सामाजिक प्रभावों पर विचार करना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश की ओर स्थित चित्रकूट में मध्य प्रदेश वाले हिस्से की तुलना में शहरीकरण और आबादी का प्रभाव अधिक होने के कारण आपराधिक गतिविधियां भी कई गुना अधिक रही हैं । अतः केवल सड़कों और भवनों को विकास का पैमाना मानना पर्याप्त नहीं है; यहाँ के सामाजिक और आध्यात्मिक वातावरण को बचाना होगा ।
चित्रकूट के वास्तविक विकास की आधारशिला ‘ग्रामोदय’ में निहित है। भारत रत्न श्री नानाजी देशमुख ने ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यहाँ महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, जो पिछले 35 वर्षों से ग्रामीणों को शिक्षित कर रहा है ।
विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और नैट्रैक्स (इंदौर) के निदेशक डॉ. मनीष जायसवाल का मानना है कि ग्रामोदय के जीर्णोद्धार और कायाकल्प के बिना चित्रकूट का समग्र विकास अधूरा है । राज्य सरकार को चित्रकूट के विकास के साथ-साथ इस संस्थान के लिए एक दीर्घकालिक योजना बनानी चाहिए, ताकि आधुनिक सुविधाओं के साथ तपोभूमि की आध्यात्मिक गरिमा और नानाजी देशमुख का ग्राम-विकास का संकल्प वास्तविक अर्थों में साकार हो सके ।