KGMU में ‘सेप्सिस अपडेट-2026’ में विशेषज्ञों का मंथन, बोले—समय पर पहचान और सही उपचार से बचाई जा सकती है जान

अशोक यादव, लखनऊ : सेप्सिस से जूझ रहे मरीज के लिए एक-एक मिनट बेहद महत्वपूर्ण है। संक्रमण की समय पर पहचान, तत्काल उपचार और सही एंटीबायोटिक का उचित डोज में इस्तेमाल मरीज की जिंदगी बचाने में निर्णायक साबित हो सकता है। वहीं एंटीबायोटिक्स के अनावश्यक और अंधाधुंध इस्तेमाल से बढ़ रहा एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस आने वाले समय में चिकित्सा जगत के सामने और बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी गंभीर विषय को लेकर किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने विश्व सेप्सिस दिवस पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाया।

विश्व सेप्सिस दिवस-2026 की थीम “सेप्सिस में निवेश करें–जानें बचाएं” रखी गई है। इस अवसर पर 12 और 13 सितंबर को KGMU में ‘सेप्सिस अपडेट-2026’ दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका आयोजन पल्मोक्रिट फाउंडेशन के तत्वावधान में सोसाइटी ऑफ प्रिसीजन मेडिसिन एंड इंटेंसिव केयर तथा नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज, उत्तर प्रदेश चैप्टर के सहयोग से किया गया। देश-विदेश से आए विशेषज्ञों ने सेप्सिस की पहचान, आधुनिक उपचार, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और ICU प्रबंधन पर विस्तार से मंथन किया।

उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. अमित कुमार घोष रहे। KGMU की कुलपति प्रो. डॉ. सोनिया नित्यानंद मुख्य संरक्षक रहीं। RMLIMS लखनऊ के पूर्व निदेशक प्रो. डॉ. दीपक मालवीय गेस्ट ऑफ ऑनर रहे। AIIMS पटना के पूर्व निदेशक डॉ. GK सिंह, KGMU के डीन एकेडमिक्स प्रो. डॉ. वीरेंद्र अतम और पैरामेडिकल संकाय के डीन प्रो. केके सिंह विशिष्ट अतिथि रहे।

कार्यक्रम में प्रो. डॉ. अविनाश अग्रवाल साइंटिफिक चेयरमैन, प्रो. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन और प्रो. डॉ. वेद प्रकाश ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी के रूप में मौजूद रहे।

एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर बनेगी राज्य नीति

डॉ. अमित कुमार घोष ने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था में एंटीबायोटिक्स के गलत और अनियंत्रित इस्तेमाल को रोकना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक लेने की प्रवृत्ति दवा-प्रतिरोधी जीवाणुओं को बढ़ावा दे रही है। इसके चलते संक्रमण का उपचार लगातार कठिन होता जा रहा है। उन्होंने एंटीमाइक्रोबियल स्टूवर्डशिप को मजबूत करने के लिए उत्तर प्रदेश में जल्द राज्य स्तरीय नीति बनाए जाने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से सम्मेलन आयोजित किए जाने की सराहना करते हुए कहा कि सेप्सिस के बेहतर प्रबंधन के लिए चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच निरंतर सहयोग जरूरी है।

हर तीन सेकंड में एक मौत

विशेषज्ञों के अनुसार सेप्सिस वैश्विक स्तर पर गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सेप्सिस से हर तीन सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष करीब 1.10 करोड़ मौतें सेप्सिस से जुड़ी हैं। वैश्विक स्तर पर इसके अधिकांश मामले निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सामने आते हैं। भारत में भी सेप्सिस का बोझ गंभीर है और ICU में भर्ती मरीजों में इसके मामले बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं।

सेप्सिस में बुखार या शरीर का तापमान असामान्य रूप से कम होना, तेज हृदय गति, तेजी से सांस लेना, सांस फूलना, निम्न रक्तचाप, भ्रम, पेशाब कम होना और त्वचा के रंग में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर स्थिति में यह सेप्टिक शॉक और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर का कारण बन सकता है।

विशेषज्ञों ने साझा किया उपचार का अनुभव

सम्मेलन में KGMU के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सौमित्र मिश्रा ने 2026 के सेप्सिस कैंपेन पर चर्चा की। रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. यश जावेरी ने शुरुआती रिससिटेशन और फ्लूइड मैनेजमेंट पर प्रकाश डाला। SGPGI के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. आर.के. सिंह ने सेप्सिस की शुरुआती पहचान और निदान पर जानकारी दी।

प्रो. डॉ. दीपक मालवीय ने सेप्सिस के परिचय, परिभाषा और महामारी विज्ञान पर व्याख्यान दिया। KGMU माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. विमला वेंकटेश ने आधुनिक डायग्नोस्टिक तकनीकों पर चर्चा की। मेदांता हॉस्पिटल लखनऊ के पीडियाट्रिक क्रिटिकल केयर विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अतहर जमाल ने बच्चों में एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी पर विचार रखे।

KGMU के डॉ. राहुल कांजीलाल ने सेप्टिक शॉक में इनोट्रोप्स और प्रेसर्स, प्रो. डॉ. RAS कुशवाहा ने सेप्सिस एवं निमोनिया और डॉ. विशाल पूनिया ने सेप्सिस में AKI पर चर्चा की। प्रो. डॉ. S.K. सोनकर ने कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों में सेप्सिस, SGPGI के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. संजय सुरेखा ने यूरोसेप्सिस तथा KGMU के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. वेद प्रकाश ने ड्रग-रेसिस्टेंट जीवों के प्रबंधन पर विशेषज्ञता साझा की। KGMU कार्डियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उमेश चंद्र त्रिपाठी ने सेप्सिस में कार्डियोमायोपैथी के प्रबंधन पर व्याख्यान दिया।

KGMU की ICU में बेहतर परिणाम

KGMU का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग सेप्सिस के गंभीर मरीजों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विभाग की 26 बेड वाली श्वसन गहन चिकित्सा इकाई में वेंटिलेटर-एसोसिएटेड निमोनिया की दर 10 प्रतिशत से कम बताई गई है। विभाग के अनुसार करीब 85 प्रतिशत मरीजों के सफल उपचार का उल्लेखनीय परिणाम भी हासिल किया गया है।

विशेषज्ञों ने स्पष्ट संदेश दिया कि सेप्सिस से लड़ाई केवल ICU तक सीमित नहीं है। संक्रमण की रोकथाम, शुरुआती लक्षणों की पहचान, समय पर अस्पताल पहुंचना, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, आधुनिक जांच और एंटीबायोटिक्स का विवेकपूर्ण इस्तेमाल—इन सभी पर निवेश करना होगा। सेप्सिस में सही समय पर लिया गया सही फैसला किसी मरीज के लिए जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन सकता है।

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