
डॉ जय प्रकाश शुक्ल : “कभी-कभी पत्रकारिता में किया गया कोई Assignment जीवन की दिशा बदल देता है। समाचार लिखने के लिए की गई एक यात्रा कब जीवन का आत्मीय अनुभव बन जाए, इसका पता भी नहीं चलता। मेरे जीवन में भारत रत्न राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख से परिचय कुछ ऐसा ही प्रसंग है।”
हिंदी के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक जागरण के स्थानीय संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए मुझे कर्वी नगर में नानाजी देशमुख के एक बौद्धिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग का अवसर मिला। मैं वहाँ एक पत्रकार के रूप में गया था, लेकिन लौटते समय अपने साथ केवल समाचार नहीं, बल्कि एक विचार लेकर लौटा।
नानाजी की बातों में गाँव केवल विकास की कोई प्रशासनिक इकाई नहीं था। उनके लिए गाँव भारत के सामाजिक जीवन की आधारभूत इकाई था। शिक्षा, स्वावलंबन, सामाजिक समरसता, श्रम, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रनिर्माण को वे जिस एकात्म दृष्टि से देखते थे, उसने मुझे गहराई से प्रभावित किया।
इसी प्रभाव का परिणाम था कि वर्ष 1991 में मैंने चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा के माध्यम से ग्रामीण विकास एवं प्रबंधन पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया।
वर्ष 1991 से 1993 तक का विद्यार्थी जीवन मेरे लिए सामान्य विश्वविद्यालयी शिक्षा से अलग अनुभव था। मैं पाठ्यक्रम में ग्रामीण विकास और प्रबंधन पढ़ रहा था, लेकिन वास्तविक शिक्षा मुझे गाँव, ग्रामीण समाज और ग्रामोदय के प्रत्यक्ष अनुभवों से मिल रही थी।
पढ़ाई के साथ कमाई और काम के माध्यम से सीखना – ग्रामोदय विश्वविद्यालय की एक विशेषता ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया—पढ़ाई के साथ कमाई। मुझे विश्वविद्यालय में अध्ययन के साथ-साथ ग्रामीण पत्रकारिता एवं जनसंपर्क से संबंधित कार्य में अंशकालिक सेवा का अवसर मिला। इसके साथ मासिक मानदेय भी प्राप्त होता था।
इस अनुभव ने मेरे सामने एक नया संसार खोला।
एक ओर ग्रामीण विकास का विद्यार्थी और दूसरी ओर पत्रकारिता एवं जनसंपर्क के काम से जुड़ा व्यक्ति—इन दोनों भूमिकाओं ने मुझे यह समझने का अवसर दिया कि ग्रामीण विकास केवल आर्थिक योजनाओं का विषय नहीं है।
विचार भी चाहिए, संवाद भी चाहिए और समाज की भागीदारी भी चाहिए। शायद इसी अनुभव ने आगे चलकर मेरे जीवन में ग्रामीण पत्रकारिता, जनसंपर्क और विकास-संचार के प्रति स्थायी रुचि का आधार बनाया।
1993 के वे पुराने कागज
हाल में अपने पुराने अभिलेखों को देखते हुए वर्ष 1993 के कुछ विश्वविद्यालयीय आदेश मेरे हाथ लगे। उन्हें देखकर ऐसा लगा जैसे तीन दशक से अधिक पुरानी स्मृतियों का कोई बंद दरवाजा अचानक खुल गया हो। जनवरी 1993 के एक आदेश में “ग्रामोदय विश्वविद्यालय समाचार” के प्रकाशन के लिए गठित संपादक मंडल में मुझे संपादक के रूप में दायित्व दिए जाने का उल्लेख है।
अप्रैल 1993 में विश्वविद्यालय परिसर में फीचर एजेंसी स्थापित किए जाने के संबंध में मेरे द्वारा विद्यार्थी के रूप में दिए गए सुझाव के आधार पर समिति गठित की गई। उस समिति में मुझे संयोजक बनाया गया तथा पत्रकारिता और अन्य विभागों को जोड़कर इस कार्य को आगे बढ़ाने की बात कही गई।
इसके बाद 21 मई 1993 को विश्वविद्यालय द्वारा “ग्रामोदय समाचार एवं फीचर सेवा” प्रारंभ किए जाने का पत्र जारी हुआ। उस पत्र की एक पंक्ति आज भी मुझे विशेष रूप से आकर्षित करती है। इसमें इस सेवा के माध्यम से—
“युगानुकूल सामाजिक पुनर्रचना में सहयोगी नई विचारधारा, चिंतन को देश की जनता के सम्मुख प्रस्तुत” करने की बात कही गई थी। 1993 में लिखी गई इस पंक्ति को आज, 2026 में पढ़ना मेरे लिए केवल पुरानी स्मृति को पढ़ना नहीं है। यह अपने अतीत और वर्तमान के बीच एक संवाद जैसा है।
110 किलोमीटर की वह यात्रा
नानाजी के विचारों को समझने का एक और अविस्मरणीय अवसर मिला—उनके नेतृत्व में चित्रकूट क्षेत्र की लगभग 110 किलोमीटर की पैदल यात्रा का। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले चित्रकूट क्षेत्र के गाँवों से गुजरते हुए ग्रामीण जीवन को बहुत निकट से देखने का अवसर मिला।
किताबों में गाँव पढ़ना और गाँव के बीच चलना—दो अलग अनुभव हैं। उस यात्रा ने मुझे सिखाया कि ग्रामोदय का वास्तविक अर्थ गाँव के बारे में बोलना नहीं, गाँव के जीवन को समझना है। ग्रामीण परिवार, खेत, श्रम, अभाव, आत्मीयता, सामाजिक संबंध और स्थानीय जीवन की अपनी लय—इन सबको करीब से देखने पर नानाजी के ग्रामोदय चिंतन का अर्थ अधिक स्पष्ट होने लगा।
तीन दशक बाद वही प्रश्न
आज जब जीवन के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखता हूँ तो एक प्रश्न फिर सामने खड़ा है— क्या नानाजी देशमुख के ग्रामोदय दर्शन को आज के युग की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनः देखा जा सकता है ?
समय बदल गया है
आज गाँव के सामने नई चुनौतियाँ हैं और हमारे पास नए साधन भी हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, ड्रोन, आधुनिक कृषि विज्ञान, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन, ग्रामीण उद्यमिता और संचार के नए माध्यमों ने संभावनाओं का एक नया संसार खोल दिया है। ऐसे समय में ग्रामोदय की मूल भावना को बनाए रखते हुए उसे युगानुकूल स्वरूप देना एक गंभीर शैक्षणिक और सामाजिक चुनौती भी है और अवसर भी।
शायद इसी विचार ने मन में एक नई कल्पना को जन्म दिया है—
युगानुकूल ग्रामोदय
यह किसी पुराने विचार को बदलने का प्रयास नहीं, बल्कि उसके मूल उद्देश्य को नई परिस्थितियों में समझने और आगे बढ़ाने का विनम्र प्रयास है। 1991 में नानाजी के विचार सुनकर मैं ग्रामोदय का विद्यार्थी बना था। 1993 में उसी परिसर में “युगानुकूल सामाजिक पुनर्रचना” के लिए विचार और चिंतन को समाज तक पहुँचाने के एक छोटे से प्रयास का सहभागी बना। और आज, 2026 में पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि कुछ यात्राएँ पूरी नहीं होतीं। वे समय के साथ नए अर्थों में लौटती रहती हैं।
शायद 1991 में बोया गया कोई बीज आज फिर अंकुरित हो रहा है— ग्रामोदय से युगानुकूल ग्रामोदय की ओर…….