
भीम प्रकाश शर्मा, श्रीगंगानगर : ब्रह्मचारी कल्याण स्वरूप जी महाराज ने कहा है कि जब तक संस्कृत भाषा जन -जन की भाषा नहीं बनेगी तब तक भारत विश्व गुरु नहीं बन पाएगा। देवभाषा संस्कृत हमारी संस्कृति की भाषा है।भारत की धरा पर जन्मी यह भाषा आज अपने ही देश में पराई हो गई है।हमें इसे जन-जन की भाषा बनाने के लिए कदम कदम पर प्रयास करना ही होगा। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रयासों से ऐसा आभास होने लगा है कि जल्द ही देवभाषा संस्कृत आमजन की भाषा बनने जा रही है।

ब्रह्मचारी कल्याण स्वरूप महाराज सोमवार तीन पुली रोड पर श्री धर्म संघ संस्कृत महा विद्यालय के प्रांगण में विगत पाँच दिनों से आयोजित तृतीय पंच दिवसीय संस्कृत-उत्सव 2026 के समापन समारोह में बोल रहे थे। कार्यक्रम का अत्यंत वैदुष्यपूर्ण, सांस्कृतिक एवं गरिमामय वातावरण में विधिवत समापन हुआ। विगत पाँच वर्षों की गौरवशाली परंपरा का अनुवहन करते हुए इस वर्ष भी देववाणी संस्कृत के प्रचार-प्रसार, संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से विविध ज्ञानवर्धक एवं शास्त्र सम्मत कार्यक्रमों का सुरुचिपूर्ण आयोजन किया गया।
पंचदिवसीय ज्ञान-महोत्सव के दैनिक सत्रों का सांगोपांग विवरण इस प्रकार रहा…….:
प्रथम दिवस (श्रावणी उपाकर्म एवं वेद-पूजन):
उत्सव का शुभारंभ वैदिक मर्यादा एवं पारंपरिक विधि-विधान के साथ ‘श्रावणी उपाकर्म’ एवं वेद-पूजन से हुआ। आचार्यों के सान्निध्य में बटुकों एवं विद्यार्थियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य उपाकर्म संस्कार संपन्न कर स्वाध्याय एवं ज्ञानार्जन का संकल्प लिया।
द्वितीय दिवस (शुल्बसूत्र एवं वेदी निर्माण व्याख्यान):
द्वितीय दिवस के अकादमिक सत्र में आदरणीय वेदपाठी जितेंद्र शुक्ल जी द्वारा शुल्बसूत्रों पर आधारित अत्यंत महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। उन्होंने वैदिक यज्ञवेदियों के निर्माण की वैज्ञानिकता, ज्यामितीय (Geometrical) संरचना, सूक्ष्म नाप-जोख तथा शास्त्रसम्मत विधि का सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत करते हुए प्राचीन भारतीय गणितीय प्रज्ञा को रेखांकित किया।
तृतीय दिवस (संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं उपादेयता):
तृतीय दिवस महाविद्यालय के प्राचार्य मुकुंद त्रिपाठी जी ने ‘संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता तथा उपादेयता’ विषय पर सारगर्भित एवं चिंतनपरक व्याख्यान दिया। उन्होंने आधुनिक परिप्रेक्ष्य, संगणक विज्ञान,भाषा विज्ञान एवं मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में देववाणी की महत्ता और प्रासंगिकता को तार्किक रूप से स्थापित किया।
चतुर्थ दिवस (‘जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्’ पंक्ति प्रदर्शनी):
संस्कृत दिवस के पावन उपलक्ष्य में चतुर्थ दिवस ‘जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्’ के राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक ध्येय वाक्य के साथ एक भव्य ‘पंक्ति प्रदर्शनी’ का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में संस्कृत साहित्य के दुर्लभ श्लोकों, सूक्तियों, नीति-वाक्यों एवं हस्तलिखित ग्रंथों के अंशों का सुरुचिपूर्ण प्रदर्शन हुआ, जिसने आगंतुकों को अत्यंत प्रभावित किया।
पंचम दिवस (समापन समारोह एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियां):
31 अगस्त को आयोजित समापन समारोह में विद्यालय के विद्यार्थियों ने अपनी अद्भुत प्रतिभा एवं संस्कृत-दक्षता का परिचय दिया। बटुकों द्वारा संस्कृत भाषा में सुगम-सरस नाटक, सुमधुर श्लोक-गान, संस्कृत संभाषण एवं परस्पर वार्तालाप की मनमोहक प्रस्तुतियां दी गईं, जिसने सम्पूर्ण सभागार को संस्कृतमय बना दिया।
अतिथियों का उद्बोधन एवं आशीर्वचन:
समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में श्री सीताराम कुटिया के अध्यक्ष पूज्य श्री रामेश्वर दास जी महाराज उपस्थित रहे। उन्होंने अपने पाथेय में संस्कृत को भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म की प्राणवायु बताते हुए विद्यार्थियों को निरंतर विद्याध्ययन हेतु शुभाशीष प्रदान किया।
समारोह की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रबंधक पूज्य श्री कल्याण स्वरूप जी महाराज ने की। अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायी अध्यक्षीय उद्बोधन में पूज्य महाराज श्री ने मैकाले की पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर तीखा कुठाराघात किया। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य प्रभाव से मुक्त होकर ही हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकते हैं। साथ ही उन्होंने विद्यार्थियों और समाज का आह्वान किया कि वे देववाणी संस्कृत के प्रति अनन्य अनुराग, निष्ठा और समर्पण भाव रखते हुए राष्ट्र व संस्कृति की सेवा में तत्पर रहें।

धन्यवाद ज्ञापन:
कार्यक्रम के समापन सत्र में महाविद्यालय के प्राचार्य मुकुंद त्रिपाठी जी ने पधारे हुए समस्त पूज्य संतों, अतिथियों, आचार्यों, प्रबुद्ध नागरिकों एवं प्रतिभागी विद्यार्थियों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया।

अंत में विश्व-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत वैदिक शांतिपाठ एवं कल्याण मंत्रों के सस्वर उच्चारण के साथ इस पंचदिवसीय भव्य ज्ञानयज्ञ का सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।