शोध को प्रोटोटाइप और उपयोगी तकनीकी समाधान में बदलने पर जोर, बीबीएयू में द्विदिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में गुरुवार 13 अगस्त को इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल के संरक्षण में रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल की ओर से प्रोटोटाइप डेवलपमेंट एंड वेलिडेशन क्लीनिक विषय पर आयोजित द्विदिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। इसके अतिरिक्त मंच पर इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल, बीबीएयू के‌ अध्यक्ष प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा, राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के साइंटिस्ट जी डॉ. पंकज कुमार श्रीवास्तव, प्रो. बाल चंद्र यादव, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल के निदेशक प्रो. शिशिर कुमार एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. जीवन सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके पश्चात आयोजन समिति की ओर से शिक्षकों को पौधा भेंट करके उनका स्वागत किया एवं। सर्वप्रथम प्रो. बाल चंद्र यादव ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का‌ स्वागत किया। इसके पश्चात कार्यक्रम संयोजक डॉ. जीवन सिंह ने सभी को कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रुपरेखा से अवगत कराया। विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने अपने संबोधन में कहा कि देश के बजट के निर्माण के दौरान सरकार द्वारा शोध एवं विकास के क्षेत्र को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। इसीलिए अनुसंधान एवं विकास से जुड़े क्षेत्रों में निवेश और बजट में निरंतर बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि शोध के क्षेत्र में प्रमुख वित्तीय सहयोग अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र से प्राप्त हो रहा है, ऐसे में शोध एवं नवाचार को समाज और उद्योग की आवश्यकताओं से जोड़ने की दिशा में और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। प्रो. मित्तल ने बताया कि भारत आज सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक बड़े उपभोक्ता के रूप में सामने आया है, लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल उपभोक्ता बने रहने के बजाय उत्पादक बनने की दिशा में आगे बढ़ें। इसके लिए देश में ऐसे नए उत्पादों और तकनीकों का विकास करना होगा, जो वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकें और रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सकें। उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य केवल नए ज्ञान का सृजन करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे ऐसे व्यावहारिक समाधान में परिवर्तित करना भी जरूरी है, जो समाज और देश की वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सके। उन्होंने शोधकर्ताओं को अपनी समस्याओं के समाधान की क्षमता विकसित करने तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने पर जोर दिया। कुलपति जी ने कहा कि जब शोध और तकनीक लोगों की वास्तविक समस्याओं के समाधान में प्रभावी भूमिका निभाएंगे, तभी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के वास्तविक उद्देश्य को सार्थक किया जा सकेगा।  इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल, बीबीएयू के‌ अध्यक्ष प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा ने इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल के माध्यम से विश्वविद्यालय में किए जा रहे विभिन्न कार्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बीबीएयू में नवाचार और नए विचारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नवकल्पना सेक्शन-8 कंपनी के माध्यम से निरंतर पहल की जा रही है। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों और शिक्षकों को नए विचारों, तकनीकी नवाचार तथा उनके व्यावहारिक उपयोग की दिशा में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में शोध एवं नवाचार को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए नवकल्पना और रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल को मिलकर कार्य करना चाहिए। दोनों के समन्वित प्रयासों से शोध के परिणामों को नवाचार, प्रोटोटाइप और उपयोगी तकनीकी समाधानों में परिवर्तित करने की दिशा में बेहतर प्रगति की जा सकती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में उपलब्ध शोध एवं विशेषज्ञता का लाभ समाज और उद्योग तक पहुंचाने के लिए नवाचार की संस्कृति को मजबूत करना आवश्यक है। इस अवसर पर उन्होंने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों को नवकल्पना से जुड़ने तथा अपने नए विचारों और शोध कार्यों को व्यावहारिक रूप देने के लिए प्रेरित किया। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के साइंटिस्ट जी डॉ. पंकज कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि किसी भी तकनीकी विचार को एक उपयोगी और कार्यशील रूप देने के लिए उसे वैज्ञानिक ज्ञान के साथ जोड़कर वास्तविक परिस्थितियों में विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी विचार से लेकर कार्यशील मॉडल तैयार करने और उसके विश्वसनीय परीक्षण तक की पूरी प्रक्रिया में तकनीकी ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस दौरान उन्होंने वैज्ञानिक व्यवहार्यता (Scientific Feasibility), इंजीनियरिंग व्यवहार्यता (Engineering Feasibility) और तकनीक को वास्तविक स्तर पर लागू करने की व्यवहार्यता के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि किसी भी तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित करने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह वैज्ञानिक रूप से कितनी उपयोगी और संभव है, उसके निर्माण एवं संचालन की तकनीकी क्षमता कितनी है तथा उसे वास्तविक परिस्थितियों में कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।  अंत में आयोजन समिति की ओर से कुलपति जी एवं अतिथियों को पटका एवं पुस्तक भेंट करके उनके प्रति आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शिक्षक, गैर शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।       

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