
सूर्योदय भारत समाचार सेवा, चित्रकूट : महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के रजत जयंती भवन स्थित बोर्डरूम में बुधवार को “भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत, इतिहास एवं सनातन संस्कृति संवर्धन” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। परिचर्चा के मुख्य वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय सह संयोजक चन्द्रकान्त रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. आलोक चौबे ने की तथा संयोजन पूर्व कुलपति एवं कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. कपिल देव मिश्रा ने किया।
मुख्य वक्ता चन्द्रकान्त ने कहा कि वर्तमान समय परिवर्तन का दौर है और आने वाले 30-40 वर्षों में भारत को केवल राजनीतिक स्वाधीनता से आगे बढ़कर वास्तविक अर्थों में स्वतंत्रता की दिशा में सफल होना है। इसके लिए आवश्यक है कि भारत को भारत बनाया जाए और भारत के मस्तिष्क को भी भारतीय बनाया जाए। उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए उसके स्वरूप, चिंतन, दृष्टिकोण और जीवन पद्धति को भारतीय दृष्टि से समझना आवश्यक है।
उन्होंने ग्रामोदय विश्वविद्यालय को इस दिशा में एक विशिष्ट एवं अनूठा विश्वविद्यालय बताते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय शिक्षा को समाज, ग्राम और भारतीय जीवन मूल्यों से जोड़ने की अपनी मूल अवधारणा के कारण भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
चन्द्रकान्त ने अरविन्द, स्वामी विवेकानंद, रविशंकर, माता अमृतानंदमयी, सद्गुरु जग्गी वासुदेव, रामकृष्ण मिशन एवं गायत्री परिवार सहित विभिन्न आध्यात्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के कार्यों और विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की आध्यात्मिक शक्ति और उसकी जीवनदृष्टि के प्रति आज पूरी दुनिया में विश्वास बढ़ रहा है। विश्व के अनेक लोग भारतीय आध्यात्मिक चिंतन और जीवन पद्धति से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. आलोक चौबे ने सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय सनातन परंपरा में विश्व को शांति, सौहार्द और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के मूल तत्वों को समझकर वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। भटकाव से विमुख होकर ऐसा प्रकाश फैलाने की आवश्यकता है, जो स्वयं के साथ दूसरों के जीवन को भी प्रकाशित करे।
कुलगुरु ने कहा कि प्रज्ञा प्रवाह जैसे संगठनों को समाज में किसी कारण से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो गए लोगों को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने वर्ष 2047 के विकसित भारत के गौरवशाली लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारतीय ज्ञान, संस्कृति एवं जीवन मूल्यों को आधार बनाकर आगे बढ़ने का आह्वान किया।
प्रज्ञा प्रवाह, कानपुर के प्रांत संयोजक मुनीश ने संगठन की गतिविधियों एवं विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। प्रज्ञा प्रवाह, कानपुर के शोध विंग के प्रांत प्रमुख डॉ. सुशील त्रिपाठी ने अतिथियों का परिचय कराया।
कार्यक्रम संयोजक एवं कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. कपिल देव मिश्रा ने परिचर्चा की पृष्ठभूमि एवं उसके औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत को समझना वर्तमान पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अतिथियों का स्वागत किया तथा अंत में आभार व्यक्त किया।
सनातन शोध संस्थान, दिल्ली के महासचिव संदीप रिछारिया ने भी परिचर्चा में अपने विचार रखे। पूर्व कुलगुरु प्रो. भरत मिश्रा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रमों में स्थान दिया जाना एक शुभ संकेत है। परिचर्चा के दौरान प्रो. आर.सी. त्रिपाठी, प्रो. रवि चौरे सहित अन्य शिक्षकों एवं प्रतिभागियों द्वारा उठाए गए जिज्ञासा एवं प्रश्नों का वक्ताओं ने समाधान किया।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, शोधार्थी एवं अन्य अकादमिक सदस्य उपस्थित रहे। परिचर्चा में भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, सनातन जीवन-दृष्टि एवं विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा संस्थानों की भूमिका को लेकर सार्थक एवं विचारोत्तेजक विमर्श हुआ।
