शोध पत्र लेखन से प्रकाशन तक की प्रक्रिया पर प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा ने साझा किए महत्वपूर्ण सुझाव

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में शुक्रवार 14 अगस्त को इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल के संरक्षण में रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल की ओर से प्रोटोटाइप डेवलपमेंट एंड वेलिडेशन क्लीनिक विषय पर आयोजित द्विदिवसीय कार्यशाला के अंतर्गत विशेष व्याख्यान सत्र का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता के तौर पर इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल के अध्यक्ष प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त मंच पर प्रो. बाल चंद्र यादव एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. जीवन सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत आयोजन समिति की ओर से मुख्य वक्ता को पौधा भेंट करने के साथ हुई। सर्वप्रथम डॉ. जीवन सिंह ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का‌ स्वागत किया और सभी को कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रुपरेखा से अवगत कराया।मुख्य वक्ता एवं इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल के अध्यक्ष प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा ने शोध पत्र लेखन की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि एक प्रभावी शोध पत्र में विषय के अनुरूप स्पष्ट शीर्षक के साथ सारांश, भूमिका, शोध की कार्यप्रणाली, शोध के परिणाम, चर्चा एवं निष्कर्ष को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि सारांश में शोध के उद्देश्य, अपनाई गई प्रक्रिया और प्रमुख निष्कर्षों को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, जबकि भूमिका में विषय की पृष्ठभूमि, पूर्व में किए गए शोध कार्यों और शोध की आवश्यकता को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। उन्होंने शोध की कार्यप्रणाली को शोध पत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि इसमें शोध के लिए अपनाई गई विधि, आंकड़ों के संग्रह एवं विश्लेषण की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया जाना चाहिए, जिससे शोध की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बनी रहे। प्रो. अरोड़ा ने शोध पत्र लेखन में मौलिकता और अकादमिक ईमानदारी पर विशेष जोर देते हुए शोध पत्र में साहित्यिक चोरी से बचने तथा शोध पत्र का समानता परीक्षण कराने की आवश्यकता बताई। उन्होंने समझाया कि समानता प्रतिशत के साथ-साथ यह देखना भी जरूरी है कि शोध पत्र के किन हिस्सों में और किस स्रोत से समानता पाई जा रही है। उन्होंने उचित संदर्भ एवं स्रोतों का उल्लेख करने, दूसरे शोधकर्ताओं के विचारों को अपने शब्दों में प्रस्तुत करने तथा अनावश्यक रूप से एक ही शोध या सामग्री को दोहराने से बचने की सलाह दी। उन्होंने दोहराए गए शोध कार्य या प्रकाशन से बचने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि शोध पत्र को जर्नल में भेजने से पहले उसकी भाषा, प्रस्तुति, संदर्भ, शोध की मौलिकता और जर्नल के दिशा-निर्देशों की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए। संपादक के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि किसी शोध पत्र के प्रकाशन पर विचार करते समय संपादक शोध की मौलिकता, विषय की प्रासंगिकता, शोध पद्धति की गुणवत्ता, परिणामों की विश्वसनीयता, निष्कर्षों की स्पष्टता, संदर्भों की गुणवत्ता और निर्धारित मानकों के अनुपालन जैसे विभिन्न पहलुओं पर विशेष ध्यान देते हैं। कार्यक्रम के दौरान एक संवाद सत्र का भी आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने शोध से संबंधित विभिन्न प्रश्न एवं जिज्ञासाएं प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा के समक्ष रखीं। प्रो. अरोड़ा ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का विस्तारपूर्वक समाधान करते हुए उनके प्रश्नों के व्यावहारिक एवं उपयोगी उत्तर दिए तथा शोध कार्य को बेहतर और प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सुझाव भी साझा किए।समस्त कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शिक्षक, गैर शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।       

Related Articles

Back to top button