अमेरिकी मध्यावधि चुनाव: ट्रंप, भारत और उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के लिए क्या हैं इसके मायने ?

3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों, भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और उत्तर प्रदेश के पारंपरिक निर्यात उद्योगों की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी संसद में सत्ता संतुलन बदलने मात्र से भारत पर लगाए गए आयात शुल्क समाप्त होने की संभावना नहीं है।

ब्रिगेडियर अनिल रमन (सेवानिवृत्त) रिसर्च फेलो, जियोस्ट्रैटेजी प्रोग्राम, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन, बेंगलुरु : अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा होंगे। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर मतदान होना है। इन चुनावों के परिणाम न केवल अमेरिकी घरेलू राजनीति की दिशा तय करेंगे, बल्कि भारत के साथ व्यापार संबंधों, आयात शुल्क, वीजा नीतियों और आर्थिक प्रतिबंधों पर भी असर डाल सकते हैं।

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की तुलना भारत की लोकसभा से की जा सकती है, जबकि सीनेट वहां की संसद के उच्च सदन के रूप में कार्य करती है। हालांकि, भारतीय राज्यसभा के विपरीत अमेरिकी सीनेट के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता करती है। प्रतिनिधि सभा के सदस्य निर्वाचन क्षेत्रों से ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली के तहत चुने जाते हैं। अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को इसमें अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है। उदाहरण के लिए, कैलिफोर्निया प्रतिनिधि सभा में सबसे अधिक सदस्य भेजने वाले राज्यों में शामिल है, जबकि भारत में उत्तर प्रदेश लोकसभा की 80 सीटों के साथ सबसे अधिक प्रतिनिधित्व वाला राज्य है।

इसके विपरीत, अमेरिकी सीनेट में प्रत्येक राज्य से दो सदस्य चुने जाते हैं, चाहे उसकी जनसंख्या कितनी भी हो। इस व्यवस्था के कारण कम आबादी वाले राज्यों को भी सीनेट में बड़े राज्यों के बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है। नतीजतन, सीनेट में छोटे और ग्रामीण राज्यों की राजनीतिक भूमिका उनकी आबादी के अनुपात से अधिक हो सकती है।

ट्रंप के लिए जनता का फैसला

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों को राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है। इसकी तुलना उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से की जा सकती है, जिनके परिणामों को 2029 के लोकसभा चुनावों के संदर्भ में भी देखा जाएगा।

ट्रंप प्रशासन के सामने महंगाई, ऊर्जा की कीमतों और विदेश नीति को लेकर कई चुनौतियां हैं। प्रस्तुत सर्वेक्षणों के अनुसार, राष्ट्रपति की लोकप्रियता में गिरावट और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर मतदाताओं की चिंता चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती है। रॉयटर्स के सर्वेक्षण में कांग्रेस में बहुमत के सवाल पर डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पार्टी पर बढ़त मिलने की बात भी सामने आई थी।

प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत बेहद सीमित होने के कारण कुछ सीटों का बदलाव भी सदन का नियंत्रण बदल सकता है। सीनेट में भी दोनों दलों के बीच मुकाबला महत्वपूर्ण होगा। ऐसे में चुनाव के परिणाम ट्रंप प्रशासन की विधायी प्राथमिकताओं और अगले दो वर्षों के राजनीतिक एजेंडे को प्रभावित कर सकते हैं।

यदि रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत बनाए रखती है, तो ट्रंप प्रशासन इसे अपनी नीतियों के समर्थन के रूप में पेश कर सकता है। दूसरी ओर, यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल करती है, तो प्रशासन के फैसलों की संसदीय जांच और निगरानी बढ़ सकती है।

रिपब्लिकन पार्टी की जीत से क्या बदलेगा ?

यदि रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में अपना बहुमत बनाए रखती है, तो ट्रंप को अपने घरेलू और आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में अपेक्षाकृत अधिक राजनीतिक सहयोग मिल सकता है। यदि पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत खो भी देती है, लेकिन हार का अंतर सीमित रहता है, तो राष्ट्रपति इसे अपने समर्थकों के बीच नीतिगत समर्थन के संकेत के रूप में पेश कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में आयात शुल्क, आव्रजन और विदेशी नागरिकों के लिए कार्य वीजा जैसे मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन का सख्त रुख जारी रह सकता है। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों और अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा नियमों में बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगे।

इसके अलावा, रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव भी जारी रह सकता है। व्यापार और प्रतिबंधों से संबंधित अमेरिकी कानूनों के तहत राष्ट्रपति प्रशासन को कुछ मामलों में व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए संसद में रिपब्लिकन बहुमत कायम रहने की स्थिति में भारत-अमेरिका संबंधों में किसी बड़े नीतिगत बदलाव की संभावना का आकलन केवल चुनावी परिणामों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से क्या आयात शुल्क हट जाएंगे ?

यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करती है, तो ट्रंप प्रशासन को अगले दो वर्षों में विधायी और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। प्रतिनिधि सभा सरकारी खर्च से जुड़े विधेयकों, संसदीय समितियों की जांच और सरकारी अधिकारियों से जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ऐसी स्थिति में डेमोक्रेटिक पार्टी प्रशासन की व्यापार नीति, आयात शुल्क और विदेश नीति से जुड़े फैसलों की समीक्षा की मांग कर सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत पर लगाए गए आयात शुल्क स्वतः समाप्त हो जाएंगे।

किसी शुल्क को हटाने के लिए कानून में बदलाव, प्रशासनिक निर्णय या न्यायिक समीक्षा जैसे अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित शुल्क किस कानूनी प्रावधान के तहत लगाया गया है। यदि राष्ट्रपति किसी विधेयक को वीटो करते हैं, तो अमेरिकी कांग्रेस को सामान्यतः दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से उस वीटो को निरस्त करना होगा।

इसके अतिरिक्त, अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण देने की नीति को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के कुछ वर्गों का समर्थन प्राप्त है। इसलिए केवल सत्ता संतुलन में बदलाव के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि भारत के निर्यातकों को तत्काल राहत मिल जाएगी।

उत्तर प्रदेश के निर्यात उद्योगों पर क्या होगा असर ?

उत्तर प्रदेश के लिए अमेरिकी मध्यावधि चुनाव केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विषय नहीं हैं। इनका संबंध राज्य के निर्यात उद्योगों, कारीगरों, छोटे कारोबारियों और रोजगार से भी है।

राज्य के निर्यात क्षेत्र में कालीन, पीतल के उत्पाद, चमड़े का सामान और जूते-चप्पल बनाने वाले उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भदोही और मिर्जापुर कालीन उद्योग के लिए प्रसिद्ध हैं, मुरादाबाद पीतल और धातु के उत्पादों के लिए जाना जाता है, जबकि कानपुर और आगरा चमड़ा तथा फुटवियर उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं।

अमेरिका इन उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण विदेशी बाजार है। यदि भारतीय वस्तुओं पर आयात शुल्क अधिक बने रहते हैं, तो अमेरिकी खरीदारों के लिए उनकी लागत बढ़ सकती है। इससे निर्यातकों को अपने मुनाफे में कटौती करने, कीमतों पर दोबारा बातचीत करने या वैकल्पिक बाजार तलाशने की जरूरत पड़ सकती है। छोटे निर्यातकों के लिए ऐसी परिस्थितियों में लागत और भुगतान संबंधी जोखिम अधिक गंभीर हो सकते हैं।

यदि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत हासिल करती है, तो आयात शुल्क नीति पर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। लेकिन शुल्कों में वास्तविक राहत तभी मिलेगी, जब संबंधित कानूनी या प्रशासनिक व्यवस्था में ठोस बदलाव होगा।

इसलिए उत्तर प्रदेश के निर्यातकों को केवल अमेरिकी चुनावों के नतीजों पर निर्भर रहने के बजाय अपने कारोबार में विविधता लाने, अन्य विदेशी बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और अमेरिकी खरीदारों के साथ दीर्घकालिक व्यापार समझौतों पर ध्यान देना चाहिए।

2028 के राष्ट्रपति चुनाव की दिशा

अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के अनुसार, कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति निर्वाचित नहीं हो सकता। ट्रंप 2024 में दूसरी बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे, इसलिए वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के तहत वह 2028 में तीसरी बार राष्ट्रपति निर्वाचित नहीं हो सकते।

हालांकि, 2026 के मध्यावधि चुनावों के परिणाम रिपब्लिकन पार्टी के भविष्य के राजनीतिक एजेंडे को प्रभावित कर सकते हैं। यदि पार्टी को उन राज्यों में नुकसान होता है जहां उसे पहले व्यापक समर्थन मिला था, तो उसके संभावित भावी नेता व्यापार, आव्रजन और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर ट्रंप की राजनीतिक विरासत से अपनी दूरी या निकटता तय कर सकते हैं।

इसके विपरीत, यदि रिपब्लिकन पार्टी चुनावों में अपना प्रभाव बनाए रखती है, तो ट्रंप की नीतियां पार्टी के भीतर आगे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। फिर भी 2026 के परिणामों को 2028 के राष्ट्रपति चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता, क्योंकि अगले दो वर्षों में आर्थिक परिस्थितियां, उम्मीदवार और राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।

भारत के लिए अवसर भी, चुनौतियां भी

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव की संभावना को समझने के लिए यह देखना आवश्यक होगा कि राष्ट्रपति के अधिकारों और कांग्रेस की शक्तियों के बीच संतुलन किस प्रकार विकसित होता है।

यदि ट्रंप की घरेलू राजनीतिक स्थिति कमजोर होती है, तो वह विदेश नीति और व्यापार समझौतों के माध्यम से राजनीतिक उपलब्धियां हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में भारत के साथ व्यापार समझौते की बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए वॉशिंगटन की ओर से पहल की संभावना बन सकती है।

दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप आयात शुल्क, आर्थिक प्रतिबंधों और वीजा नियमों को बातचीत में दबाव के साधन के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ व्यापारिक और विदेश नीति संबंधी मामलों में संसद की पूर्व स्वीकृति के बिना कार्रवाई करने के अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए कांग्रेस में बहुमत बदलने के बावजूद कार्यपालिका की शक्तियों का महत्व बना रहेगा।

भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता को आगे बढ़ाए। इसके लिए शुल्कों में स्थिरता, भारतीय वस्तुओं के लिए बाजार तक पहुंच और पेशेवरों की आवाजाही जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे।

निष्कर्ष: निर्यातकों के लिए व्यापार समझौता सबसे अहम

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के परिणाम ट्रंप प्रशासन की राजनीतिक स्थिति, संसदीय निगरानी और नीतिगत प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन भारत पर लगाए गए आयात शुल्कों, वीजा नियमों या आर्थिक प्रतिबंधों में बदलाव का फैसला केवल चुनावी परिणामों से तय नहीं होगा।

भदोही के कालीन बुनकरों, मुरादाबाद के पीतल उद्योग से जुड़े कारीगरों और कानपुर-आगरा के चमड़ा तथा फुटवियर निर्यातकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत और अमेरिका अपने व्यापारिक मतभेदों को किस हद तक सुलझा पाते हैं।

अंततः उत्तर प्रदेश के निर्यात उद्योगों का भविष्य अमेरिकी सत्ता संतुलन के साथ-साथ भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता, शुल्कों की वास्तविक दरों, अमेरिकी बाजार में मांग और निर्यातकों की वैकल्पिक बाजारों तक पहुंच पर निर्भर करेगा। चुनाव राजनीतिक दिशा का संकेत दे सकते हैं, लेकिन कारोबार को स्थिरता वास्तविक नीतिगत फैसलों से ही मिलेगी।

लेखक : ब्रिगेडियर अनिल रमन (सेवानिवृत्त)

ब्रिगेडियर अनिल रमन (सेवानिवृत्त) बेंगलुरु स्थित तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में रिसर्च फेलो हैं और संस्थान के डिफेंस फेलोशिप प्रोग्राम का नेतृत्व करते हैं। उन्हें विवादित सीमाओं पर सैन्य तैनाती और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में कमांड एवं स्टाफ का व्यापक अनुभव है। वे ‘रेडफोर’ (REDFOR) विश्लेषक के रूप में कार्य कर चुके हैं और आर्मी वॉर कॉलेज में वरिष्ठ प्रशिक्षक रह चुके हैं। उन्होंने कॉलेज ऑफ एयर वॉरफेयर का हायर एयर कमांड कोर्स भी पूरा किया है तथा अमेरिका की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फेलो के रूप में कार्य किया है।

उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ वायोमिंग से मास्टर डिग्री प्राप्त की है। उनके अध्ययन का प्रमुख विषय राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल के दौरान भारत के प्रति अमेरिकी विदेश नीति के निर्धारण की प्रक्रिया रहा है। उनका वर्तमान शोध अमेरिकी घरेलू राजनीति और विदेश नीति के अंतर्संबंध, भविष्य के संघर्षों की बदलती प्रकृति तथा सैन्य अभियानों की रणनीतियों पर केंद्रित है।

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