भारत की तकदीर बदलने वाले पांच प्रधानमंत्री और उनके ऐतिहासिक फैसले; डॉ. अतुल मलिकराम ने किया गहन विश्लेषण

डॉ. अतुल मलिकराम, भोपाल : भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल के खात्मे के बाद से लेकर आधुनिक दौर तक देश की राजनीति, समाज, तकनीक और अर्थव्यवस्था में कई युगांतकारी बदलाव आए हैं । प्रसिद्ध राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने भारत की दिशा को पूरी तरह बदलने वाले पांच प्रधानमंत्रियों और उनके द्वारा लिए गए उन ऐतिहासिक विधिक व नीतिगत फैसलों का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जिन्होंने आधुनिक राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव रखी ।

मोरार जी देसाई की संवैधानिक जवाबदेही और राजीव गाँधी की आईटी (IT) क्रांति
डॉ. अतुल मलिकराम के विश्लेषण के अनुसार, मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा किया गया 44वां संविधान संशोधन

देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने आपातकाल की प्रक्रियाओं को कठोर बनाया और नागरिकों के जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों (अनुच्छेद 20 और 21) को अक्षुण्ण विधिक संरक्षण दिया। इसके उपरांत, राजीव गांधी के कार्यकाल में देश को तकनीकी आधुनिकीकरण की ओर मोड़ा गया। उनके द्वारा दूरसंचार अनुसंधान केंद्र (सी-डॉट) व एमटीएनएल की स्थापना तथा सॉफ्टवेयर नीति ने भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र के वैश्विक उभार की मजबूत आधारशिला रखी।

वी.पी. सिंह का सामाजिक न्याय, नरसिम्हा राव का आर्थिक उदारीकरण और मनमोहन सिंह की परमाणु कूटनीति
रणनीतिकार ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) की सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के निर्णय ने देश में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की राजनीति को एक नया विधिक आयाम दिया, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी मामले में भी बरकरार रखा। इसके ठीक बाद, गंभीर भुगतान-संतुलन संकट के बीच प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह की जोड़ी ने नई औद्योगिक नीति के माध्यम से लाइसेंस राज को समाप्त कर आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धी बनाया।

आगे चलकर, डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल में भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु सहयोग समझौता एक महान रणनीतिक व कूटनीतिक विजय साबित हुआ। परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए बिना भारत ने वैश्विक परमाणु व्यापार में विशेष छूट हासिल की, जिसने देश की रणनीतिक स्वायत्तता को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की। डॉ. अतुल मलिकराम ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि किसी भी प्रधानमंत्री का वास्तविक विधिक व ऐतिहासिक मूल्यांकन उनके तत्कालीन राजनीतिक लाभ-हानि से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि उनके फैसलों ने आने वाली पीढ़ियों के विकास का कितना मार्ग प्रशस्त किया !

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