
सूर्योदय भारत समाचार सेवा, चित्रकूट : मॉं मंदाकिनी के निर्मल (प्रदूषण मुक्त) और अविरल (निरंतर प्रवाह) स्वरूप को बनाए रखने के लिए एकीकृत और बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जिसके अंतर्गत तकनीकी, पारिस्थितिक और सामाजिक भागीदारी शामिल है।इसके लिए दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा सीवेज प्रबंधन एवं पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर दो दिवसीय विचार-विमर्श बैठक-सह-कार्यशाला एवं क्षेत्र भ्रमण का आयोजन किया गया, जिसका समापन रविवार को आरोग्यधाम के सभागार में हुआ। कार्यशाला के समापन सत्र में प्रसिद्ध पर्यावरणविद एवं परिस्थिकिविद प्रो सी आर बाबू ने अपने महत्वपूर्ण सुझाव रखे तो वही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भोपाल के निदेशक डॉ ए के विद्यार्थी ने तीनों टीमों के विचारों का प्रस्तुतिकरण किया। इस दौरान सभी टीमों के सदस्यों द्वारा महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए। सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन द्वारा किया गया और कोषाध्यक्ष वसंत पंडित द्वारा अथितियों व विशेषज्ञों को मोमेंटो प्रदान किये गए।

क्षेत्र सर्वेक्षण के लिए तीन टीमों जिसमें पहली ‘नदी पुनरुद्धार व वाटरशेड प्रबंधन और जैव विविधता का पुनर्जीवन और संरक्षण’, दूसरी टीम द्वारा सीवेज प्रबंधन, और तीसरी टीम द्वारा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के संदर्भ में फील्ड सर्वेक्षण किया। जिसके आधार पर विशेषज्ञों ने बताया कि माँ मन्दाकिनी को निर्मल (स्वच्छ) बनाने के लिए सीवेज और अपशिष्ट को उपचारित करना, प्लास्टिक और कचरे का प्रबंधन, नदियों में प्लास्टिक, शव, पूजा सामग्री और ठोस कचरा फेंकने पर सख्ती से रोक लगाई होगी। साथ ही प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहन देना होगा, फ्लोटिंग वेटलैंड्स जो पानी के ऊपर तैरते हुए कृत्रिम वेटलैंड्स का उपयोग करना होगा जो पोषक तत्वों और प्रदूषकों को सोखकर पानी को शुद्ध करते हैं। जैविक उपचार से प्रदूषित जल के उपचार के लिए पर्यावरण के अनुकूल एंजाइमों का उपयोग करना होगा।

कार्यशाला के समापन सत्र में एक्सपर्ट ने बताया कि नदियों को अविरल व निरंतर प्रवाह बनाए रखने के लिए नदी के जलग्रहण क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना होगा, जिससे पानी की निरंतर आपूर्ति बनी रहे। नदी के किनारों पर सघन वृक्षारोपण को बढ़ावा देना होगा, जो न केवल मृदा कटाव को रोकते हैं बल्कि जल स्तर को बनाए रखने में भी सहायक हैं। नदियों के आस पास तालाबों और जलाशयों का अधिक मात्रा में निर्माण करना होगा ताकि वर्षा जल सीधे नदी में जाकर जल स्तर बढ़ा सके। नदियों के किनारे कूप नलिका बनाकर धरती की ऊपरी परत के पानी को अंदरूनी जल व्यवस्था में जमा करना सुनिश्चित करना होगा, साथ ही हमें अन्य महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे जिसके अंतर्गत स्थानीय समुदायों, ग्राम पंचायतों, स्कूल, कालेज में नदियों की सफाई के प्रति जागरूक करना और उन्हें सक्रिय रूप से सफाई अभियानों में शामिल करना।
नदियों को “जीवित इकाई” मानकर कड़ाई से कानूनी संरक्षण प्रदान करना होगा, साथ ही नदी के बहाव क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करना, सहायक नदी – नालों को पुनर्जीवित करना एवं उनका सीमांकन करना होगा। माँ मन्दाकिनी को अविरल-निर्मल बनाये रखने के लिए गठित तीनो समूह अपनी अपनी रिपोर्ट्स 1 माह के अंदर कमेटी को देंगें जिससे एक समन्वित कार्य योजना बनाकर उसका पालन करना सुनिश्चित किया जा सके।
सीवेज प्रबंधन एवं पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के लिए विशेषज्ञों द्वारा किये गये क्षेत्र सर्वेक्षण के दौरान दिये गये सुझाव
केन्द्रीय भूजल बोर्ड भोपाल और लखनऊ द्वारा क्षेत्र का जल-भूवैज्ञानिक अध्ययन, क्षेत्र का ड्रोन सर्वेक्षण, मौजूदा घास के मैदानों, तालाबों, रिचार्ज पिट्स, चेक डैम, बांधों आदि की सूची तैयार करना, एक प्रशिक्षण और निगरानी इकाई (सेल) का गठन, स्थानीय प्रजातियों के पौधों की नर्सरी तैयार करना, ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के तहत वाटरशेड प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे का विकास करना, उपचारित (ट्रीटेड) पानी का पुन: उपयोग, आश्रमों / होटलों को मुख्य सीवर नेटवर्क से जोड़ना या विकेंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करना, खुले में शौच को हतोत्साहित करने के लिए उपचार प्रणाली (ट्रीटमेंट सिस्टम) से युक्त शौचालय ब्लॉक बनाना, SBR-आधारित STP के चालू होने तक, गाद निकालने (desilting) के बाद ‘स्टेबिलाइज़ेशन तालाबों’ का उपयोग करना, अमावस्या के दौरान तीर्थयात्रियों के सीवेज के प्रबंधन के लिए एक प्रणाली तैयार करना, सेप्टिक टैंक / घरेलू अपशिष्ट जल (sullage) का प्रबंधन, तीर्थयात्रियों के लिए आधुनिक शौचालयों की व्यवस्था / DRDO मॉडल / ड्राई मॉडल / HUL द्वारा सुविधा मॉडल, ट्रैश बूम (कचरा रोकने वाला बैरियर), सिविल निगरानी समिति, बाढ़ की गंभीरता को झेलने के लिए सीवर नेटवर्क की जाँच करना, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, कचरे के उचित संग्रह, पृथक्करण, परिवहन और प्रसंस्करण का मुद्दा, CSR के तहत गीले कचरे और सूखे कचरे का प्रसंस्करण।