उत्तर प्रदेश राज्य संग्रहालय द्वारा डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला में मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद पर गंभीर चिंतन

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ : उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने राज्य संग्रहालय में संस्कृति विभाग द्वारा “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल की स्मृति में शनिवार को आयोजित व्याख्यानमाला की सफलता के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी। उन्होने अपने संदेश में कहा कि यह व्याख्यानमाला इतिहासविदों एवं छात्रों के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।

उत्तर प्रदेश के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” (26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026) के अंतर्गत In and out of the Chaos: Money and Monetary Issues in Post Mauryan India विषय पर एक महत्वपूर्ण अकादमिक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में इतिहास, पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, अर्थव्यवस्था एवं भारतीय संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संग्रहालय प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता प्रो. सुष्मिता बसु मजूमदार, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, कोलकाता विश्वविद्यालय, कोलकाता रहीं। उन्होंने अपने व्याख्यान में मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न राजनीतिक परिवर्तनों तथा उनके आर्थिक एवं मौद्रिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि उत्तर-मौर्यकाल को प्रायः राजनीतिक विखंडन और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय का काल माना जाता है, किंतु इसी काल में भारतीय मुद्रा-व्यवस्था और व्यापारिक संरचनाओं में महत्वपूर्ण परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं।

प्रो. मजूमदार ने बताया कि मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद शुंग, कण्व, इंडो-ग्रीक, शक, पार्थियन, कुषाण तथा अनेक स्थानीय राजवंशों का उदय हुआ। इन राजनीतिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में विविध प्रकार की मुद्राओं का प्रचलन बढ़ा, जिसने भारतीय मुद्राशास्त्र को अत्यंत समृद्ध बनाया। उन्होंने विभिन्न धातुओं से निर्मित सिक्कों, उनकी निर्माण तकनीकों, अभिलेखों, प्रतीकों तथा चित्रात्मक अभिव्यक्तियों का उल्लेख करते हुए बताया कि ये मुद्राएँ केवल विनिमय का माध्यम नहीं थीं, बल्कि राजनीतिक वैधता, सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण साक्ष्य भी हैं।

अपने व्याख्यान में उन्होंने इंडो-ग्रीक और कुषाण शासकों की मुद्राओं का विशेष उल्लेख करते हुए बताया कि इन सिक्कों में भारतीय एवं विदेशी कलात्मक परंपराओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि उत्तर-मौर्यकालीन मुद्रा-व्यवस्था के अध्ययन से उस समय के व्यापारिक मार्गों, अंतरराष्ट्रीय संपर्कों, नगरीकरण तथा आर्थिक समृद्धि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मारुति नंदन तिवारी, पूर्व विभागाध्यक्ष, कला एवं इतिहास विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा की गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि मुद्राएँ इतिहास लेखन का अत्यंत विश्वसनीय स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर-मौर्यकालीन भारत की राजनीतिक और आर्थिक संरचना को समझने के लिए मुद्राशास्त्रीय साक्ष्यों का अध्ययन अनिवार्य है। उन्होंने मुख्य वक्ता के शोधपरक एवं विश्लेषणात्मक व्याख्यान की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के विमर्श विद्यार्थियों और शोधार्थियों को इतिहास की नई व्याख्याओं से परिचित कराते हैं।

इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने मुख्य वक्ता, अध्यक्ष तथा उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के ऐसे विद्वान थे जिन्होंने प्राचीन भारतीय स्रोतों के अध्ययन को नई दिशा प्रदान की। उनकी स्मृति में आयोजित यह व्याख्यानमाला भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों पर गंभीर अकादमिक चर्चा का महत्वपूर्ण मंच बन रही है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक (सज्जा कला), राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया। उन्होंने विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए मुख्य वक्ता एवं अध्यक्ष का परिचय कराया तथा कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
व्याख्यान के उपरांत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने उत्तर-मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था, सिक्का-निर्माण तकनीक, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा मुद्राशास्त्र से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे। मुख्य वक्ता ने विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए विषय के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट किया।

कार्यक्रम अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं शोधपरक रहा। उपस्थित विद्वानों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने इसे भारतीय आर्थिक इतिहास और मुद्राशास्त्र की समझ को समृद्ध करने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन बताया।

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