शोध क्षमता को मजबूत करने पर बीबीएयू में राष्ट्रीय संगोष्ठी, विशेषज्ञों ने साझा किए शोध के वैश्विक आयाम

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में मंगलवार 18 अगस्त को रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल एवं फाइनेंस एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में ‘अनुसंधान क्षमता को सुदृढ़ करना (Strengthening Research Capacity)’ विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने की। इसके अतिरिक्त मंच पर रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल, बीबीएयू के निदेशक प्रो. शिशिर कुमार, सउदी इलेक्ट्रानिक यूनिवर्सिटी, सउदी अरब के डिपार्टमेंट ऑफ ई- कॉमर्स विभाग के डॉ. प्रकाश सिंह, एआई एंड टेक्नोलॉजी डिविजन, वेरकोस ग्रुप, लखनऊ के शिवेंद्र सिंह चौहान, वर्नाकुलर कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर डायरेक्टर के अमित सिंह बघेल, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड कामर्स के संकायाध्यक्ष प्रो. अमित कुमार सिंह एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. रमेश कुमार चतुर्वेदी उपस्थित रहे। सर्वप्रथम कार्यक्रम संयोजक डॉ. रमेश कुमार चतुर्वेदी ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया। साथ ही प्रो. अमित कुमार सिंह ने सभी को कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रुपरेखा से अवगत कराया।

विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने विद्यार्थियों को शोध एवं विकास के महत्व पर संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय में शोध केवल अकादमिक उपलब्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने विद्यार्थियों को नवीन विचारों के साथ शोध के क्षेत्र में आगे आने, समस्याओं की पहचान कर उनके व्यावहारिक समाधान विकसित करने तथा अनुसंधान में नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने के लिए प्रेरित किया। प्रो. मिश्रा ने कहा कि विद्यार्थियों की जिज्ञासा, रचनात्मक सोच और शोध क्षमता को उचित मार्गदर्शन एवं संसाधनों के माध्यम से विकसित कर उन्हें देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बनाया जा सकता है।

रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल, बीबीएयू के निदेशक प्रो. शिशिर कुमार ने शोध एवं विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि शोध की शुरुआत किसी जिज्ञासा या विचार से होती है, जिसे निरंतर प्रयास, प्रयोग और विश्लेषण के माध्यम से उपयोगी परिणाम में बदला जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों को विषय की गहन समझ विकसित करने, उपलब्ध शोध कार्यों का अध्ययन करने तथा अपने कार्य में मौलिकता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए प्रेरित किया। प्रो. कुमार ने विशेष रूप से शोध फंडिंग प्राप्त करने के विभिन्न माध्यमों एवं तरीकों की जानकारी देते हुए शोध प्रस्ताव को प्रभावी ढंग से तैयार करने और उपयुक्त फंडिंग अवसरों की पहचान करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शोध को केवल डिग्री या प्रकाशन तक सीमित न रखते हुए ज्ञान के विस्तार, नवाचार और वास्तविक समस्याओं के समाधान का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

सउदी इलेक्ट्रानिक यूनिवर्सिटी, सउदी अरब के डिपार्टमेंट ऑफ ई- कॉमर्स विभाग के डॉ. प्रकाश सिंह ने शोध नैतिकता(Research Ethics) पर चर्चा करते हुए शोध कार्य में ईमानदारी, पारदर्शिता और जिम्मेदारी के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शोध केवल नए निष्कर्ष प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी शोध प्रक्रिया में नैतिक मानकों का पालन करना भी आवश्यक है। उन्होंने शोधकर्ताओं को डेटा के सही एवं निष्पक्ष उपयोग, स्रोतों के उचित संदर्भ, मौलिकता, अकादमिक ईमानदारी तथा प्लेजरिज्म से बचने के प्रति जागरूक किया। साथ ही, उन्होंने बताया कि शोध के दौरान प्रतिभागियों के अधिकारों एवं गोपनीयता का सम्मान करते हुए प्राप्त परिणामों को सत्य एवं जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि शोध समाज और ज्ञान के विकास में विश्वसनीय एवं सकारात्मक योगदान दे सके।

एआई एंड टेक्नोलॉजी डिविजन, वेरकोस ग्रुप, लखनऊ के शिवेंद्र सिंह चौहान ने ‘शोध एवं विकास प्रक्रिया’ पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि शोध पत्र का प्रकाशन शोध की अंतिम मंजिल नहीं है, बल्कि इसके बाद शोध के परिणामों को वास्तविक प्रभाव और उपयोगिता में बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है। उन्होंने शोध के विभिन्न चरणों पर प्रकाश डालते हुए समस्या की पहचान से लेकर शोध के प्रभाव तक की पूरी यात्रा को समझाया। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में कई स्तरों से होकर गुजरना पड़ता है और विभिन्न चरणों में परियोजनाएं तकनीकी चुनौतियों, संसाधनों की कमी, उचित दिशा के अभाव या अन्य व्यावहारिक समस्याओं के कारण अटक सकती हैं। चौहान ने सभी प्रतिभागियों को इन चुनौतियों की पहचान करने, उनके समाधान के प्रभावी तरीकों को अपनाने तथा शोध को प्रयोगशाला से वास्तविक उपयोग और प्रभाव तक पहुंचाने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी।

वर्नाकुलर कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर डायरेक्टर के अमित सिंह बघेल ने ‘ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेज’ विषय पर चर्चा करते हुए शोध एवं डेटा के प्रभावी उपयोग के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अच्छे डेटा की पहचान के लिए यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि डेटा किस उद्देश्य के लिए एकत्र किया जा रहा है। उन्होंने शोधकर्ताओं को अपने उत्तरदाताओं (Respondents) को समझने, डेटा का सावधानीपूर्वक एवं उद्देश्यपूर्ण तरीके से संग्रह करने तथा उसकी प्रक्रिया में उचित सावधानी बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया।बघेल ने बताया कि शोध के निष्कर्षों को सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें आसानी से समझा जा सके। इसके साथ ही उन्होंने शोध के दायरे से आगे जाकर संभावित पहलुओं पर विचार करने तथा शोध से पहले और शोध के बाद की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण करने की आवश्यकता पर भी चर्चा की।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने भी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। उन्होंने अपने शोध कार्य, विषय से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं एवं प्राप्त निष्कर्षों को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करते हुए अपने विचार साझा किए। इस दौरान विद्यार्थियों को उनके सक्रिय सहभागिता एवं शोध-पत्र प्रस्तुत करने के लिए प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

अंत में आयोजन समिति की ओर से अतिथियों एवं शिक्षकों को स्मृति चिन्ह देकर उन्हे सम्मानित किया गया। साथ ही डॉ. रमेश कुमार चतुर्वेदी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

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