बीबीएयू में ‘मिशन लाइफ’ कार्यशाला का आयोजन, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर हुआ मंथन

अशोक यादव, लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में मंगलवार 26 मई को सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल इंक्लूजन, बीबीएयू एवं समाजशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘मिशन लाइफ’ विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम विश्व पर्यावरण दिवस 2026 को ध्यान में रखकर और पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास एवं प्रकृति के प्रति जन-जागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। इसके अतिरिक्त मुख्य तौर पर डीन ऑफ अकेडमिक अफेयर्स प्रो. एस. विक्टर बाबू, अंबेडकर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की संकायाध्यक्ष प्रो. शूरा दारापुरी, अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सनातन नायक, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल इंक्लूजन, बीबीएयू की निदेशक प्रो. जया श्रीवास्तव एवं राजनीति‌ विज्ञान विभाग के प्रो. सार्तिक बाघ उपस्थित रहे।

विश्वविद्यालय कुलपति प्रो राज कुमार मित्तल ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में विश्व एक गंभीर पर्यावरणीय संकट के दौर से गुजर रहा है और ऐसी स्थिति में हमें पर्यावरण संबंधी मुद्दों को अत्यंत गंभीरता के साथ लेते हुए ठोस एवं संवेदनशील कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि हमें ‘विकसित भारत 2047’ के स्वप्न को साकार करना है, तो देश की अर्थव्यवस्था को 30 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुँचाना होगा और यह विकास प्रकृति के संतुलन और संसाधनों के संरक्षण के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण एवं न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि पर्यावरण का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँच सके। उन्होंने यह भी कहा कि प्रकृति को प्राकृतिक संसाधनों के निर्माण में हजारों वर्ष लगते हैं, इसलिए इनके संरक्षण के प्रति समाज में संवेदनशीलता और जागरूकता विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘सर्कुलर इकॉनमी’ की अवधारणा पर बल देते हुए ‘रीड्यूज, रियूज एवं  रीसाइकिल’ के मंत्र को अपनाने की अपील की तथा सतत विकास आधारित जीवनशैली को भविष्य की आवश्यकता बताया।

अंबेडकर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की संकायाध्यक्ष प्रो. शूरा दारापुरी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण के प्रति केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि हमें पृथ्वी और प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना है, तो हमें उनकी उपयोगिता, सीमितता और महत्व को गंभीरता से समझना होगा। क्योंकि प्राकृतिक संसाधन केवल उपभोग की वस्तुएँ नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी अमूल्य विरासत हैं, जिन्हें संरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। प्रो. दारापुरी ने पर्यावरण को “माँ” के समान बताते हुए उसकी पूजा, संरक्षण और संवेदनशील देखभाल करने की प्रेरणा दी।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल इंक्लूजन, बीबीएयू की निदेशक प्रो. जया श्रीवास्तव ने चर्चा के दौरान कहा कि आज के समय में ‘मिशन लाइफ’ केवल एक अभियान नहीं, बल्कि मानवता के सुरक्षित भविष्य का आधार है। उन्होंने कहा कि हम सभी का यह नैतिक दायित्व है कि मानवता, प्रकृति और भविष्य के बीच संतुलन स्थापित करें। कोई भी पर्यावरणीय नीति, तकनीक या विकास योजना तब तक सार्थक नहीं हो सकती, जब तक समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित न हो।

अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सनातन नायक ने अपने वक्तव्य में आर्थिक विकास, ऊर्जा संकट तथा उसके पर्यावरणीय प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक प्रगति प्रत्येक राष्ट्र की प्राथमिकता बन चुकी है, किन्तु अनियंत्रित औद्योगीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने ऊर्जा संकट को गंभीर बना दिया है। बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं के कारण जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, जिससे प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

इस अवसर पर विद्यार्थियों ने भी पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास एवं सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। साथ ही उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को सामूहिक दायित्व बताते हुए जागरूकता फैलाने का संकल्प भी व्यक्त किया। साथ ही पर्यावरण संरक्षण एवं हरित भविष्य के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से वृक्षारोपण अभियान का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने पौधारोपण कर प्रकृति संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

अंत में डॉ. ब्रजेश ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

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