
डॉ. जय प्रकाश शुक्ल – जनसंपर्क अधिकारी, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट : आश्विन मास की पूर्णिमा अर्थात् शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर जन्मे भारत रत्न राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख का जीवन भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति, ग्रामोदय और निःस्वार्थ सेवा का जीवंत प्रतीक है। उनका जन्म 11 अक्टूबर 1916 को शरद पूर्णिमा के दिन महाराष्ट्र के परभणी जिले के कडोली गाँव में हुआ था।
शरद पूर्णिमा भारतीय परंपरा में पूर्ण चंद्रमा, प्रकाश, पवित्रता और कृतज्ञता का पर्व है। नानाजी का जीवन भी इसी पूर्णिमा की तरह सरल, प्रकाशमान और जन-कल्याण के प्रति समर्पित रहा।
पूर्णिमा के प्रकाश में जन्म
नानाजी देशमुख का मूल नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख था। उनका जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ, इसलिए उनकी जयंती प्रत्येक वर्ष आश्विन पूर्णिमा अर्थात् शरद पूर्णिमा पर मनाई जाती है।
इस वर्ष 25 अक्टूबर 2026 को शरद पूर्णिमा है और इसी अवसर पर नानाजी की 110वीं जयंती मनाई जाएगी। चित्रकूट में इस अवसर पर तीन दिवसीय भव्य शरदोत्सव का आयोजन किया जाएगा, जो उनके जीवन, विचार और कार्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा।
सेवा, संघर्ष और सादगी का जीवन
कम उम्र से ही नानाजी में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और समाजसेवा की भावना दिखी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और उत्तर प्रदेश में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया।
उनका व्यक्तित्व सादगी, त्याग, अनुशासन और कर्मठता का संगम था। वे सत्ता को अवसर नहीं, बल्कि जनसेवा का साधन मानते थे और सार्वजनिक जीवन में शुचिता के प्रतीक बने।
सत्ता से ऊपर चरित्र
आपातकाल के बाद नानाजी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल में मंत्री बनने का अवसर मिलने पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया और सामाजिक-सांगठनिक कार्य को अपना ध्येय बनाया।
उन्हें 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया और राज्यसभा के लिए मनोनीत भी किया गया। परंतु उनका सच्चा क्षेत्र संसद नहीं, बल्कि गाँवों का विकास था।
आपातकाल और लोकतंत्र की रक्षा
1975 में जब देश में आपातकाल लगाया गया, तब नानाजी देशमुख लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रिय रहे। उन्होंने भूमिगत रहकर विरोध आंदोलन को संगठित किया और आपातकाल के विरुद्ध जनांदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान उन्होंने जेपी को पुलिस की लाठीचार्ज की स्थिति से सुरक्षित बाहर निकाला था। यह घटना उनके साहस, संगठन-कौशल और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
आपातकाल के बाद वे जनता पार्टी के गठन में सक्रिय रहे और 1977 में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने सत्ता के स्थान पर समाज-निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाया।
दीनदयाल दर्शन के धरोहर
पं. दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद नानाजी ने 1968 में दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। इस संस्थान का उद्देश्य दीनदयाल जी के एकात्म मानवदर्शन को शोध और व्यावहारिक कार्य के माध्यम से धरातल पर उतारना था।
दीनदयाल शोध संस्थान केवल विचार-चर्चा की संस्था नहीं था; इसे ‘थिंक एंड डू टैंक’ कहा जाता है। इसके माध्यम से नानाजी ने ग्रामीण विकास, स्वावलंबन, स्वास्थ्य, जल, कृषि और आजीविका से जुड़े व्यावहारिक मॉडल विकसित किए।
उन्होंने एकात्म मानवदर्शन को केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की व्यावहारिक कार्यपद्धति बनाया। उनका मानना था कि राष्ट्र का सच्चा विकास तभी संभव है, जब गाँव का आम व्यक्ति अपने विकास में स्वयं भागीदार बने।
नानाजी का ग्रामीण विकास का कार्य केवल चित्रकूट तक सीमित नहीं था। उन्होंने ग्राम सभाओं और स्थानीय भागीदारी के माध्यम से विकास का कार्य किया। उन्होंने ग्रामीणों को यह प्रेरणा दी कि अपने विकास के लिए वे स्वयं जिम्मेदारी लें। यही दृष्टिकोण आगे चलकर उनके ग्राम स्वराज मॉडल का आधार बना।
गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प
नानाजी का सबसे स्थायी कृतित्व चित्रकूट क्षेत्र में ग्राम विकास का प्रयोग है। उन्होंने “हर खेत में पानी, हर हाथ को काम” के सिद्धांत को धरातल पर उतारा और ग्रामीण विकास के चार स्तंभ गिनाए—शिक्षा, स्वावलंबन, स्वास्थ्य और समरसता।
जयप्रकाश नारायण और प्रभावती देवी की स्मृति में उन्होंने ‘जयप्रभा ग्राम’ विकसित किया। यह प्रयोग यह सिद्ध करता है कि गाँवों को दान या दया की नहीं, आत्मनिर्भरता और संगठित प्रयास की आवश्यकता होती है।
चित्रकूट परियोजना और ऊर्जा क्रांति
चित्रकूट की पावनता, प्रभु श्री राम की स्मृतियों तथा अनुसूया आश्रम के महंत श्री भगवानानंद जी महाराज के आग्रह से प्रेरित होकर नानाजी चित्रकूट आए और यहाँ ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा के आधार पर एक आत्मनिर्भर विकास मॉडल तैयार किया। उनके प्रयासों का परिणाम था कि सैकड़ों गाँव ‘चित्रकूट परियोजना’ से जुड़े।
उनके नेतृत्व में चित्रकूट क्षेत्र में जैव ऊर्जा और सौर ऊर्जा आधारित विकास मॉडल विकसित हुए। इन प्रयोगों ने ग्रामीण ऊर्जा की समस्या के समाधान के साथ-साथ स्थानीय रोजगार और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ाया।
पाँच सौ गाँवों का स्वावलंबन
नानाजी ने चित्रकूट के आसपास के 500 से अधिक गाँवों को स्वावलंबी बनाने की दिशा में कार्य किया। इस परियोजना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी घटने, शिक्षा का विस्तार होने, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होने और सामाजिक एकता मजबूत होने का उल्लेख किया जाता है। यह नानाजी के ग्रामोदय दर्शन का ठोस परिणाम था।
चित्रकूट: कर्मभूमि और कर्मस्थली
जीवन के अंतिम वर्षों में नानाजी ने चित्रकूट को अपनी कर्मभूमि बनाया। यहीं उन्होंने ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वावलंबन के अपने विचारों को व्यावहारिक रूप दिया। चित्रकूट की पवित्र भूमि, पावन सलिला माँ मंदाकिनी का तट और ग्रामीण समाज की सेवा उनके जीवन का केंद्र बन गई। उनका निधन भी 27 फरवरी 2010 को चित्रकूट में ही हुआ, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष ग्रामोदय के कार्य में बिताए।

ग्रामोदय विश्वविद्यालय: ज्ञान की नई धारा
नानाजी देशमुख की सबसे प्रेरक संस्थागत देन महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय है। उन्होंने 1991 में चित्रकूट में देश के प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसका प्रारंभिक नाम चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय रखा गया।
यह विश्वविद्यालय केवल उच्च शिक्षा की संस्था नहीं है; यह नानाजी के ‘ग्रामोदय’ दर्शन का जीवंत केंद्र है। इसका उद्देश्य ग्रामीण समाज को शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य, कृषि और स्वावलंबन के माध्यम से सशक्त बनाना है।
नानाजी इस विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलाधिपति रहे और लगभग तीन वर्षों तक इसका नेतृत्व किया। उनका मानना था कि विश्वविद्यालय को केवल डिग्री देने वाली इमारत नहीं, बल्कि गाँव की समस्याओं का समाधान खोजने वाला ज्ञान-केंद्र बनना चाहिए।
ग्रामोदय विश्वविद्यालय श्रृंखला का प्राकट्य
भारत रत्न राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख के ग्रामोदय दर्शन को अपनाने के लिए देश के अनेक राज्यों में संभावनाओं को तलाशने हेतु व्यक्तिगत और संस्थागत पहल की गई। इसके लिए समय-समय पर विशेषज्ञ दलों ने महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय परिसर का प्रत्यक्ष भ्रमण किया।
विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलगुरु प्रो. आलोक चौबे के सशक्त एवं प्रभावी नेतृत्व में 11 अक्टूबर 2026 को ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कृषि प्रक्षेत्र परिसर को ‘भारतरत्न नानाजी देशमुख परिसर’ के रूप में परिवर्तित किया गया। नवसृजित नानाजी पीठ एवं नानाजी विचार मंच के माध्यम से नानाजी के ग्रामोदय दर्शन, शोध एवं विचार-गतिविधियों को संचालित किया जाएगा।

शरदोत्सव: स्मृति से श्रद्धांजलि तक
चित्रकूट में नानाजी देशमुख के जन्मदिन पर आयोजित होने वाला तीन दिवसीय शरदोत्सव उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को स्मरण करने का भव्य माध्यम बन चुका है। इसमें पारंपरिक नृत्य, गायिकी, भजन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को विशेष स्थान दिया जाता है।
यह उत्सव केवल स्मृति नहीं, बल्कि नानाजी के ग्रामोदय, स्वावलंबन और सेवा के आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का अवसर है। दीन दयाल परिसर में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम चित्रकूट की आध्यात्मिक परंपरा और नानाजी के सामाजिक दर्शन को जोड़ता है।
चित्रकूट में हाल में आई बाढ़ को दृष्टिगत रखते हुए प्रारंभ में इसे एक दिवसीय रखने का प्रस्ताव था, परंतु स्थानीय पूज्य संतों की भावना एवं आकांक्षा को ध्यान में रखते हुए आयोजकों ने इसे इस वर्ष भी तीन दिवसीय परंपरागत शरदोत्सव के रूप में आयोजित करने का निर्णय लिया।
दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन के अनुसार नानाजी के प्रति जन-श्रद्धा और सम्मान का भाव इस बार भी 25 से 27 अक्टूबर तक चित्रकूट में देखने को मिलेगा।
भारत रत्न: राष्ट्र का कृतज्ञ सम्मान
भारत सरकार ने 2019 में नानाजी देशमुख को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया। यह सम्मान उनके शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में किए गए अथक कार्यों की मान्यता थी।
नानाजी देशमुख की विरासत यह संदेश देती है कि सच्चा राजनेता वह नहीं जो सत्ता पाए, बल्कि वह है जो सत्ता को जन-कल्याण के लिए प्रयोग करना जाने। दीनदयाल शोध संस्थान, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय और शरदोत्सव उनकी इस विरासत के जीवंत प्रमाण हैं।
ग्राम स्वराज के शिल्पकार
नानाजी को ‘ग्राम स्वराज का शिल्पकार’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने गाँवों को स्वयं के विकास का केंद्र बनाया। उनका मॉडल बाहरी सहारे पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय संसाधनों, जन-भागीदारी और सामूहिक प्रयास पर आधारित था।
उनका यह दर्शन आज भी ग्राम पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास कार्यक्रमों और ग्रामीण उद्यमिता के लिए प्रासंगिक है। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि विकास की सच्ची इकाई गाँव है और उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसके निवासी हैं।
युवाओं के लिए आदर्श प्रेरणा
नानाजी देशमुख का जीवन युवाओं के लिए आदर्श प्रेरणा है। उन्होंने यह सिखाया कि सत्ता-लोभ, पद और सुख-सुविधा से ऊपर उठकर समाजसेवा, कौशल विकास और ग्रामीण भारत के निर्माण को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उनका संदेश है कि देश को बदलने के लिए केवल नीतियाँ नहीं, बल्कि चरित्र, कर्म और जन-सेवा की भावना चाहिए। यही कारण है कि उनका जीवन आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
जो जीवन उत्सव बन गया
राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख केवल एक राजनेता या समाजसेवी नहीं थे; वे गांधीवादी ग्राम स्वराज्य और दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन को धरातल पर उतारने वाले राष्ट्रनिर्माता थे। शरद पूर्णिमा पर उनका जन्म और चित्रकूट में तीन दिवसीय शरदोत्सव यह बताते हैं कि उनका जीवन भारतीय संस्कृति, सेवा और राष्ट्रभक्ति का अमूल्य उत्सव है।