
सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ । बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में गुरुवार 6 अगस्त को प्रबंध अध्ययन विभाग की ओर से ‘एनईपी 2020 : विकसित भारत के लिए शिक्षा में परिवर्तन और उत्कृष्टता को बढ़ावा” विषय पर आयोजित द्विदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ। समापन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। मुख्य अतिथि के तौर पर आईसीएआर- सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रापिकल हार्टिकल्चर , लखनऊ के निदेशक डॉ. टी. दामोदरन उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त मंच पर विशिष्ट अतिथि एवं फेडरल बैंक के गवर्नमेंट एंड इंस्टीट्यूशनल बिजनेस के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और कंट्री हेड अनूप थालाचल, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड कामर्स के संकायाध्यक्ष प्रो. अमित कुमार सिंह एवं कार्यक्रम समन्वयक प्रो. तरुणा उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। विश्वविद्यालय कुलगीत गायन के पश्चात आयोजन समिति की ओर से अतिथियों को पौधा भेंट करके उनका स्वागत किया गया। सर्वप्रथम प्रो. तरुणा ने दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए संगोष्ठी के दौरान आयोजित विभिन्न शैक्षणिक सत्रों, विचार-विमर्श, प्रमुख निष्कर्षों तथा प्राप्त उपलब्धियों से उपस्थित जनों को अवगत कराया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि यदि व्यक्ति दृढ़ संकल्प और सकारात्मक सोच के साथ किसी अच्छे उद्देश्य को प्राप्त करने का निश्चय करता है, तो उसे अवश्य सफलता मिलती है। उन्होंने कहा कि विकसित और सशक्त भारत का निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से संभव नहीं है, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक तथा अन्य सभी क्षेत्रों में समन्वित एवं संतुलित विकास की आवश्यकता है। उन्होंने शिक्षा को समाज में परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि शिक्षा ही वह शक्ति है, जो व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करती है तथा विद्यार्थियों को अपनी क्षमताओं को पहचानने, निखारने और उन्हें समाज एवं राष्ट्रहित में उपयोग करने के लिए सक्षम बनाती है। प्रो. मित्तल ने युवाओं को आह्वान करते हुए कहा कि समय की मांग है कि वे केवल रोजगार प्राप्त करने तक स्वयं को सीमित न रखें, बल्कि उद्यमिता और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि यदि भारत को वास्तविक अर्थों में विश्वगुरु बनाना है, तो ऐसे युवाओं का निर्माण करना होगा जो रोजगार खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाले बनें। इसी क्रम में उन्होंने विद्यार्थियों को ‘अर्निंग व्हाइल लर्निंग’ का संदेश देते हुए कहा कि शिक्षा के साथ-साथ कौशल विकास, नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से उन्हें अध्ययन काल में ही आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए, ताकि वे अपने ज्ञान को व्यवहारिक रूप देते हुए राष्ट्र निर्माण में प्रभावी योगदान दे सकें। मुख्य अतिथि एवं आईसीएआर- सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रापिकल हार्टिकल्चर , लखनऊ के निदेशक डॉ. टी. दामोदरन ने कहा कि भारत ने फसल उत्पादकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों और गुणवत्ता के अनुरूप नए मानदंड स्थापित करना आवश्यक है। उन्होंने कृषि क्षेत्र में जैव ईंधन (बायोफ्यूल) की बढ़ती उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए इसे ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। साथ ही उन्होंने पौधों में होने वाले विभिन्न रोगों की समय पर पहचान, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा आधुनिक अनुसंधान आधारित तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. दामोदरन ने बताया कि कृषि के सतत विकास के लिए केवल किसी एक विज्ञान या तकनीक तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बहुविषयक दृष्टिकोण अपनाते हुए नई वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति से निरंतर सीखते रहना समय की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं एवं शोधार्थियों को नवाचार, अनुसंधान और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर कृषि क्षेत्र को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए प्रेरित किया।विशिष्ट अतिथि एवं फेडरल बैंक के गवर्नमेंट एंड इंस्टीट्यूशनल बिजनेस के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और कंट्री हेड श्री अनूप थालाचल ने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि बदलते वैश्विक परिवेश में सफलता प्राप्त करने के लिए केवल तकनीकी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व में कुछ विशेष गुणों का होना भी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से विनम्र और दूरदर्शी बनने का आह्वान किया तथा कहा कि उभरती हुई प्रौद्योगिकियों के साथ स्वयं को भी निरंतर अपडेट रखना समय की मांग है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद मानवीय संवेदनाओं को कभी नहीं खोना चाहिए। साथ ही उन्होंने ‘मैजिक ऑफ लिसनिंग’ अर्थात धैर्यपूर्वक और गंभीरता से दूसरों को सुनने की कला को प्रभावी नेतृत्व, बेहतर संवाद और व्यक्तिगत विकास की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि यदि युवा इन मूल्यों और गुणों को अपने जीवन में आत्मसात करेंगे, तो वे न केवल अपने करियर में उत्कृष्टता प्राप्त करेंगे, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकेंगे।कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रतिभागियों के लिए प्लेनरी सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य तौर पर बीबीएयू के डीन ऑफ अकेडमिक अफेयर्स प्रो. एस. विक्टर बाबू, स्कूल ऑफ एजुकेशन के संकायाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही, इग्नू, नयी दिल्ली के शिक्षा विभाग के प्रो. ए.के. झा एवं कार्यक्रम समन्वयक प्रो. तरुणा उपस्थित रहीं। इस अवसर पर प्रतिभागियों के लिए तीन तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया। प्रथम तकनीकी सत्र इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, लखनऊ के निदेशक प्रो. निशांत कुमार एवं बीबीएयू के प्रबंध अध्ययन विभाग के डॉ. सलिल सेठ के मार्गदर्शन में ‘अनुसंधान, नवाचार एवं उद्योग–शिक्षा समन्वय’ विषय पर आयोजित किया गया। द्वितीय तकनीकी सत्र बीबीएयू के प्रो. सनातन नायक एवं डॉ. अर्पित शैलेश के दिशानिर्देशन में ‘समानता, समावेशन एवं सामाजिक न्याय’ विषय पर आयोजित किया गया। तीसरे तकनीकी सत्र के दौरान चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी की प्रो. सुनीता भरतवाल ऑनलाइन माध्यम से जुड़ी। प्रो. भरतवाल एवं बीबीएयू की डॉ. लता बाजपेई सिंह के मार्गदर्शन में ‘विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आपातकालीन क्षेत्र एवं विविध विषय’ विषय पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम के समापन सत्र पर शोध-पत्र प्रस्तुतीकरण प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उनकी शैक्षणिक प्रतिभा एवं शोध के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए उन्हें उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ भी दी गईं। अंत में आयोजन समिति की ओर से अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं शॉल भेंट करके उनके प्रति आभार व्यक्त किया गया। साथ ही प्रो. अमित कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। समस्त कार्यक्रम के दौरान विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, गैर शिक्षण अधिकारी एवं कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।




