बीबीएयू में प्रथम नॉर्थ ईस्ट कल्चरल फेस्ट 2026 आयोजित : लोक नृत्य, गीतों और परंपराओं की शानदार प्रस्तुति

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में मंगलवार 5 मई को प्रथम नार्थ ईस्ट कल्चरल फेस्ट 2026 का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। मुख्य अतिथि के तौर पर डॉ. बोनिक चंद्र ब्रह्मा, आईएफएस अधिकारी एवं अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, पूर्वी क्षेत्र गोरखपुर, उत्तर प्रदेश मौजूद रहे। इसके अतिरिक्त डीन ऑफ अकेडमिक अफेयर्स प्रो. एस. विक्टर बाबू एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. सोमीपेम आर. शिमरे उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं बाबासाहेब की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। विश्वविद्यालय कुलगीत गायन के पश्चात आयोजन समिति की ओर से अतिथियों को पुष्पगुच्छ भेंट करके उनका स्वागत किया गया। सर्वप्रथम कार्यक्रम संयोजक डॉ. सोमीपेम आर. शिमरे ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया एवं सभी को कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रुपरेखा से अवगत कराया।

विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने आयोजन समिति को इस प्रकार के सराहनीय एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने कहा कि आज उत्तर-पूर्व भारत तीव्र गति से विकास के पथ पर अग्रसर है और वहाँ के लोगों व विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी वैश्विक मंचों पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि केंद्र सरकार विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से उत्तर-पूर्व के समग्र विकास को निरंतर प्रोत्साहित कर रही है, जिससे वहाँ के युवाओं को नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं और क्षेत्र की प्रगति को नई दिशा मिल रही है।

मुख्य अतिथि डॉ. बोनिक चंद्र ब्रह्मा ने अपने संबोधन में कहा कि “सेवन सिस्टर्स” के नाम से प्रसिद्ध उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। उन्होंने बताया कि संस्कृति जीवन जीने का तरीका है, जिसमें परंपराएं उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। उन्होंने उत्तर-पूर्व की विविध संस्कृति, खान-पान, वेशभूषा एवं वहां के लोगों के प्रकृति के प्रति गहरे लगाव का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की प्राकृतिक धरोहर ही इसे विश्व में एक विशिष्ट पहचान दिलाती है। डॉ. ब्रह्मा ने आगे बताया कि उत्तर-पूर्व में वन पारिस्थितिकी को नष्ट करने के बजाय वन्यजीव संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्होंने वहां की अनूठी “शेयरिंग कल्चर” का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी कारण वहां भिक्षावृत्ति और वृद्धाश्रम लगभग न के बराबर देखने को मिलते हैं, साथ ही समाज में लैंगिक समानता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

इस दौरान एक डॉक्यूमेंट्री का भी प्रस्तुतीकरण किया गया, जिसमें उत्तर-पूर्व भारत की समृद्ध संस्कृति, विभिन्न जनजातियों के रहन-सहन, परंपराओं एवं प्राकृतिक जीवन शैली को प्रभावी रूप से दर्शाया गया। साथ ही उत्तर-पूर्व के विद्यार्थियों ने पारंपरिक लोक नृत्य, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों एवं मधुर गीतों के माध्यम से अपनी समृद्ध विरासत की मनमोहक झलक प्रस्तुत की, जिसने कार्यक्रम को अत्यंत आकर्षक बना दिया।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, गैर शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

Related Articles

Back to top button