बीबीएयू में ‘समावेशी विकास, विधिक संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक आयाम – बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की दृष्टि मेंं’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

अशोक यादव, लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय द्वारा शनिवार 11 -14 अप्रैल तक चार दिवसीय ‘अम्बेडकर जयंती’ एवं ‘विश्वविद्यालय स्थापना दिवस’ समारोह के‌ अंतर्गत विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम के दूसरे दिन रविवार 12 अप्रैल को ‘समावेशी विकास, विधिक संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक आयाम: बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की दृष्टि मेंं’ विषय में एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। मुख्य अतिथि के तौर पर माननीय प्रो. सतीश चन्द्र द्विवेदी, पूर्व राज्यमंत्री, बेसिक शिक्षा (स्वतंत्र प्रभार), उत्तर प्रदेश सरकार उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त मंच पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर राजा महेन्द्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के पूर्व कुलपति प्रो. चंद्रशेखर एवं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा के महात्मा ज्योतिबा फुले चेयर के प्रभारी प्रो. एस.के. चहल, शिक्षा विभाग, बीबीएयू के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राज शरण शाही एवं विधि विभाग, बीबीएयू की विभागाध्यक्ष प्रो. सुदर्शन वर्मा मौजूद रहीं। सर्वप्रथम प्रो. राज शरण शाही ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया एवं सभी को कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रुपरेखा से अवगत कराया। मंच संचालन का कार्य डॉ. विवेक नाथ त्रिपाठी द्वारा किया गया।

विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने अपने संबोधन में कहा कि विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए समाज के समावेशी विकास की अत्यंत आवश्यकता है, और इसके लिए हमें डॉ. भीमराव अंबेडकर के आदर्शों पर चलना होगा। उन्होंने कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसलिए हमें केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जो समानता, समरसता, स्वतंत्रता और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जैसे मूल्यों पर आधारित हो।

मुख्य अतिथि प्रो. सतीश चन्द्र द्विवेदी ने अपने वक्तव्य में सतत विकास के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि इसके तीन प्रमुख आधार हैं। उन्होंने कहा कि पहला आयाम है विकास की गति में निरंतरता और अर्थव्यवस्था में स्थायित्व, जिससे देश की प्रगति लंबे समय तक बनी रह सके। प्रो. द्विवेदी ने बताया कि यदि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है तो हमें बाबासाहेब, दीनदयाल और अन्य महान विचारकों के आदर्शों पर चलते हुए एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील नए समाज की स्थापना करनी होगी।

विशिष्ट अतिथि प्रो. चंद्रशेखर ने अपने वक्तव्य में कहा कि बाबासाहेब के व्यक्तित्व को किसी एक निश्चित ढांचे में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे 20वीं सदी के एक बहुआयामी और युगांतरकारी विचारक थे। उन्होंने बाबासाहेब के जीवन के संघर्षों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और देश-विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। प्रो. चंद्रशेखर ने बाबासाहेब की प्रमुख कृतियों जैसे ‘शूद्र कौन थे?’, ‘राज्य और अल्पसंख्यक’, ‘मूकनायक’ और ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कृतियां आज भी समाज को दिशा देने का कार्य करती हैं !

विशिष्ट अतिथि प्रो. एस.के. चहल ने‌ चर्चा के दौरान कहा कि समाज की वास्तविक प्रगति सभी के लिये समान अवसर और कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि समावेशिता को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ना अत्यंत आवश्यक है, ताकि संवैधानिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके। प्रो. चहल ने बताया कि डॉ. भीमराव अंबेडकर और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के पर्याय हैं, क्योंकि बाबासाहेब ने ही सामाजिक लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी।

प्रो. राज शरण शाही ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. अम्बेडकर के चिंतन में सामाजिक उत्थान की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में लाने के लिए निरंतर संघर्ष किया और ‘मूकनायक’ से ‘लोकनायक’ बनने तक का उनका सफर अत्यंत प्रेरणादायक और मार्गदर्शक है।

प्रो. सुदर्शन वर्मा ने बताया कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने राजनीतिक दृढ़ता, सामाजिक समानता, स्वतंत्रता तथा वंचित वर्गों और महिलाओं के उत्थान के लिए निरंतर कार्य किया। उनका प्रसिद्ध नारा ‘शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो’ आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।

इस अवसर पर प्रतिभागियों के लिए ‘राष्ट्र निर्माण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का योगदान’ विषय पर पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता  का आयोजन किया गया। साथ ही  ‘समावेशी‌ विकास, विकसित भारत का आधार – डॉ. भीमराव अम्बेडकर की दृष्टि में’ विषय पर वाद -‌ विवाद, क्विज प्रतियोगिता एवं रंगोली प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीण उद्योग, हस्तशिल्प, पारंपरिक कला एवं विविध लोक उत्पादों से संबंधित वस्तुओं का अत्यंत सजीव, आकर्षक एवं सराहनीय प्रदर्शन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, गैर शिक्षण अधिकारी एवं कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे। प्रो. हरिशंकर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
           

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