तपेदिक शोध की पड़ताल : बीबीएयू के वैज्ञानिकों का नया अध्ययन उजागर करता है शोधपत्र वापसी के पैटर्न

डॉ. युसुफ़ अख्तर

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के डॉ. युसुफ़ अख्तर और पुस्तकालय विज्ञान विभाग के डॉ. विनीत कुमार ने मिलकर 1993 से 2023 के बीच वापस लिए गए टीबी से जुड़े 150 शोधपत्रों का गहन विश्लेषण किया है। यह अध्ययन स्प्रिंगर नेचर की प्रतिष्ठित पत्रिका आर्काइव्स ऑफ माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इसके लिए उन्होंने रिट्रैक्शन वॉच, स्कोपस, पबमेड और वेब ऑफ साइंस जैसे बड़े डेटाबेस का उपयोग किया। यह अब तक का सबसे व्यवस्थित अध्ययन है जो बताता है कि टीबी के शोधपत्र क्यों, कब और कैसे वापस लिए जाते हैं और वापसी के बाद क्या होता है।

इस अध्ययन में पहली बार तीस साल के दौरान टीबी यानी तपेदिक से जुड़े वापस लिए गए शोधपत्रों की पूरी तस्वीर सामने रखी गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि भारत में वैज्ञानिक ईमानदारी का संकट किस तरह बढ़ रहा है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने शोध टीम को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं और उनकी इस उपलब्धि को विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय बताया।

तपेदिक हर साल करीब 15 लाख लोगों की जान लेती है और यह दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारी बनी हुई है। अकेले भारत में दुनियाभर के टीबी मामलों का 26 प्रतिशत हिस्सा है। इसलिए टीबी के इलाज, जाँच और दवा से जुड़े शोध की सच्चाई और ईमानदारी केवल वैज्ञानिकों की चिंता नहीं है बल्कि यह पूरे देश की सार्वजनिक सेहत का सवाल है।

अध्ययन के दौरान एक साफ़ पैटर्न दिखा कि 1993 से 2009 के बीच टीबी से जुड़े शोधपत्र बहुत कम वापस लिए गए। लेकिन 2010 के बाद यह संख्या तेज़ी से बढ़ी और 2021 तथा 2022 में सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँची एवं दोनों साल 22-22 शोधपत्र वापस लिए गए। हालाँकि कुल प्रकाशनों के मुकाबले यह अनुपात अभी भी कम है, फिर भी यह चिंताजनक है।

शोधकर्ता डॉ. युसुफ़ अख्तर ने जानकारी देते हुए बताया कि टीबी शोध में वापस लिए गए पेपर भले ही संख्या में कम लगें, लेकिन उनका नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है। गलत शोध के आधार पर इलाज की गाइडलाइन बन सकती है, दवाएँ बनाई जा सकती हैं और सरकारी नीतियाँ तय हो सकती हैं। हम इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि अध्ययन में 150 वापस लिए गए शोधपत्रों में 60 अलग-अलग कारण पाए गए। अधिकतर मामलों में एक साथ दो से चार कारण थे।

सबसे आम कारण थे अविश्वसनीय नतीजे (32 मामले), डेटा में गड़बड़ी (31 मामले), और पत्रिका या प्रकाशक द्वारा जाँच (29 मामले)। जानबूझकर की गई बेईमानी भी खूब दिखी फ़र्ज़ी शोध कारखाने यानी पेपर मिल (12 मामले), नकली समीक्षा (10 मामले), तस्वीरों की नकल (17 मामले) और नैतिक अनुमति न लेना (11 मामले)। साथ ही पहली बार उनकी शोध टीम ने वापसी के कारणों को तीन वर्गों में बाँटा- पहला, लेखकों की जानबूझकर की गई बेईमानी, दूसरा, अनजाने में हुई तकनीकी या टाइपिंग की गलतियाँ और तीसरा, प्रकाशक या व्यवस्था की प्रक्रिया संबंधी चूक।

डॉ. अख्तर ने बताया कि सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि जिन 143 वापस लिए गए शोधपत्रों का हवाला-डेटा मिला, उनमें से 85.3 प्रतिशत को वापसी के बाद भी दूसरे शोधपत्रों में उद्धृत किया जाता रहा। इससे भी ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि 43 पेपर ऐसे थे जिन्हें सही रहते हुए कभी कोई हवाला नहीं दिया गया, लेकिन वापसी के बाद उन्हें उद्धृत किया जाने लगा।

डॉ. विनीत कुमार

शोधकर्ता डॉ. विनीत कुमार ने चर्चा के दौरान कहा कि यही सबसे बड़ा ख़तरा है कि एक बार वापस लिया गया पेपर विज्ञान की दुनिया से गायब नहीं होता। उसमें मौजूद गलत जानकारी सालों तक शोध, इलाज और नीतियों को प्रभावित करती रह सकती है। उन्होंने बताया कि अध्ययन में यह भी पाया गया कि वापस लिए गए टीबी शोधपत्र हर स्तर की पत्रिकाओं में छपे थे। हिंदावी, एल्सेवियर, स्प्रिंगर और टेलर एंड फ्रांसिस जैसे बड़े प्रकाशकों की पत्रिकाओं में भी ये पेपर मिले। PLOS ONE में सबसे ज़्यादा 9 टीबी पेपर वापस लिए गए। यह साफ़ संदेश है कि बड़ी और प्रसिद्ध पत्रिकाएँ भी बेईमानी से अछूती नहीं हैं। डॉ. कुमार ने बताया कि देशों के हिसाब से सबसे ज़्यादा चीन द्वारा 64 शोधपत्र वापस लिये गये थे। भारत 22 शोध-पत्र के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद अमेरिका (12), ईरान (11), पाकिस्तान और ब्रिटेन (9-9) का नाम आता है। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि जो देश ज़्यादा शोध प्रकाशित करते हैं, स्वाभाविक रूप से उनके यहाँ वापसी की संख्या भी ज़्यादा होगी।

बीबीएयू का यह अध्ययन ऐसे समय में आया है जब भारत में वैज्ञानिक ईमानदारी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रिट्रैक्शन वॉच डेटाबेस के अनुसार भारत में 2025 में 887 शोधपत्र वापस लिए गए, जो दुनिया में चीन (1,701) के बाद दूसरा सबसे बड़ा आँकड़ा है। इराक (429), रूस (363), सऊदी अरब (343) और अमेरिका (277) इसके बाद आते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत दुनिया के कुल शोध प्रकाशनों में केवल 5 प्रतिशत का योगदान करता है, लेकिन वैश्विक वापसी में उसकी हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत है। इसके पीछे कुछ जानी-मानी वजहें हैं। भारत का राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढाँचा यानी एनआईआरएफ लंबे समय से प्रकाशन की संख्या और उद्धरण के आधार पर रैंकिंग देता रहा है, जिससे गुणवत्ता की बजाय मात्रा पर ज़ोर बढ़ा। इसके अलावा भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.65 प्रतिशत शोध एवं विकास पर खर्च करता है, जबकि वैश्विक औसत करीब 2.46 प्रतिशत है।

भारत सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए कुछ ठोस कदम उठाए हैं। अब एनआईआरएफ रैंकिंग में वापस लिए गए शोधपत्रों के लिए अंक काटे जाते हैं। अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन यानी एएनआरएफ ने यह अनिवार्य कर दिया है कि शोध अनुदान के लिए आवेदन करते समय शोधकर्ता पिछले पाँच साल की अपनी वापस ली गई पेपरों की जानकारी देंगे। इसके अलावा इन्फ्लिबनेट, शोधगंगा और आईआरआईएनएस जैसे प्लेटफॉर्म पर वापसी की जानकारी जोड़ी जा रही है और शोधकर्ताओं की प्रोफाइल पर भी वापसी की स्थिति दिखाई जाएगी।

लेखकों का मानना है कि विज्ञान में भरोसे की नींव पारदर्शिता है। लेकिन केवल नीतियाँ बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए हमें सांस्कृतिक बदलाव चाहिए जैसे युवा शोधकर्ताओं को सही तरीके से प्रशिक्षित करना होगा, शोध के मूल्यांकन का तरीका बदलना होगा और जब ईमानदारी पर सवाल उठे तो संस्थाओं को जवाबदेही के साथ काम करना होगा। लेखकों ने कई सुधारों की माँग की है जैसे शोधपत्र प्रकाशन की शर्त के रूप में डेटा को सार्वजनिक रूप से जमा करना अनिवार्य किया जाए, वापसी की सूचनाएँ स्पष्ट और एक समान तरीके से दी जाएँ, समुदाय द्वारा की जाने वाली समीक्षा को मान्यता दी जाए और ऐसी प्रणाली बनाई जाए जो शोधकर्ताओं को तुरंत सूचित करे जब उनके द्वारा उद्धृत कोई पेपर वापस लिया जाए।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि PubPeer पर हुई चर्चाओं और रिट्रैक्शन वॉच के आधिकारिक रिकॉर्ड में 80.3 प्रतिशत मेल था, जो यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक समुदाय की सामूहिक निगरानी भी बहुत कारगर है। लेखकों ने यह भी आगाह किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कंप्यूटर आधारित शोध में अगर प्रयोगशाला में जाँच न की जाए तो गलत नतीजे और भी तेज़ी से फैल सकते हैं।

मीडिया संपर्क:
डॉ. युसुफ़ अख्तर – 8263875486
डॉ. विनीत कुमार – 9454120174

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