“महिला दिवस विशेष” सपनों की उड़ान : शिक्षिका और लेखिका डॉ. प्रियंका सौरभ

✍️ डॉ. विजय गर्ग : समाज के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ स्त्रियों ने सीमित संसाधनों और अनेक सामाजिक बंधनों के बावजूद अपने साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प से जीवन की नई दिशाएँ तय की हैं। स्त्री केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशील चेतना भी है। जब एक स्त्री अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेती है, तो वह केवल अपने जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को प्रेरित करने का सामर्थ्य रखती है। ऐसी ही प्रेरक कहानी है शिक्षिका, लेखिका और संवेदनशील विचारक डॉ. प्रियंका सौरभ की, जिनकी जीवन यात्रा संघर्ष, साधना और सृजन का सुंदर संगम है।

हरियाणा के हिसार जिले के आर्यनगर गाँव के साधारण ग्रामीण परिवेश में जन्मी डॉ. प्रियंका सौरभ का बचपन सामान्य परिस्थितियों में बीता। उनके जीवन में न तो विशेष संसाधन थे और न ही कोई विशेष सुविधा। लेकिन उनके भीतर शिक्षा प्राप्त करने और जीवन में कुछ सार्थक करने की गहरी इच्छा अवश्य थी। यही इच्छा आगे चलकर उनके संकल्प की शक्ति बन गई।

उनकी शिक्षा-यात्रा के दौरान ही जीवन ने एक बड़ा मोड़ लिया जब स्नातक की पढ़ाई के दौरान उनका विवाह हो गया। विवाह के बाद उनके सामने पत्नी, बहू और बाद में माँ की जिम्मेदारियाँ आ खड़ी हुईं। अक्सर भारतीय समाज में ऐसे अवसर पर लड़कियों की शिक्षा और उनके सपने पीछे छूट जाते हैं। घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ ही उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र बन जाती हैं। लेकिन डॉ. प्रियंका सौरभ ने परिस्थितियों को अपनी सीमाएँ बनने नहीं दिया। उन्होंने अपने जीवन की चुनौतियों को स्वीकार किया, लेकिन अपने सपनों को कभी त्यागा नहीं।

विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। यह कार्य आसान नहीं था। सीमित समय, घरेलू कार्यों का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ—इन सबके बीच शिक्षा की राह पर आगे बढ़ना किसी तपस्या से कम नहीं था। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर परिश्रम के बल पर उन्होंने राजनीति विज्ञान में डबल एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने एम.फिल की पढ़ाई पूरी की और आगे पीएच.डी. के शोध कार्य की दिशा में भी निरंतर प्रयासरत रहीं।

उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह उस संघर्ष और समर्पण का परिणाम हैं जिसने हर कठिनाई को चुनौती दी। जीवन की इसी निरंतर साधना ने उन्हें सरकारी सेवा के क्षेत्र में भी सफलता दिलाई। पाँच बार सरकारी सेवा में चयनित होना किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह उनके अथक प्रयास, आत्मविश्वास और लक्ष्य के प्रति समर्पण का प्रमाण है। अंततः उन्होंने हरियाणा शिक्षा विभाग में प्रवक्ता के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।

एक शिक्षिका के रूप में डॉ. प्रियंका सौरभ केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने तक सीमित नहीं रहतीं। वे अपने विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और सकारात्मक सोच का बीज बोने का प्रयास करती हैं। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है। वे विद्यार्थियों को यह समझाने का प्रयास करती हैं कि जीवन में सफलता केवल अंकों या डिग्रियों से नहीं मिलती, बल्कि मेहनत, अनुशासन और निरंतर सीखने की इच्छा से मिलती है।

शिक्षण कार्य के साथ-साथ डॉ. प्रियंका सौरभ ने साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनके लिए लेखन केवल एक शौक नहीं, बल्कि जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जब भी उन्हें समय मिलता, वे अपने अनुभवों, संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को शब्दों में ढालने का प्रयास करतीं। धीरे-धीरे यह प्रयास एक सशक्त साहित्यिक यात्रा में बदल गया।

उनकी रचनाओं में स्त्री जीवन की संवेदनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ, मानवीय संबंधों की जटिलताएँ और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों की गहरी अनुभूति देखने को मिलती है। वे केवल कल्पना के संसार में नहीं रहतीं, बल्कि समाज के वास्तविक अनुभवों को अपनी लेखनी का आधार बनाती हैं।

उनका काव्य संग्रह “दीमक लगे गुलाब” रिश्तों की उन अदृश्य दरारों को उजागर करता है जो अक्सर दिखाई नहीं देतीं, लेकिन धीरे-धीरे संबंधों को भीतर से कमजोर कर देती हैं। इसी तरह “चूल्हे से चाँद तक” स्त्री जीवन के संघर्ष, सपनों और आकांक्षाओं की यात्रा को दर्शाता है। यह संग्रह बताता है कि स्त्री की दुनिया केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; उसके सपने आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं।

“मौन की मुस्कान” उनकी एक और महत्वपूर्ण कृति है जिसमें उन चुप्पियों को आवाज़ दी गई है जिन्हें स्त्रियाँ अक्सर अपने भीतर ही समेट लेती हैं। यह संग्रह पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि समाज में कितनी ही भावनाएँ और पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें शब्द नहीं मिल पाते।

बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है। “परियों से संवाद” और “बच्चों की दुनिया” जैसी कृतियाँ बच्चों की कल्पनाशीलता, जिज्ञासा और संवेदनशीलता को अभिव्यक्त करती हैं। इन रचनाओं में बालमन की सहजता और सरलता को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

निबंध लेखन के क्षेत्र में उनका संग्रह “समय की रेत पर” विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें उन्होंने सामाजिक परिवर्तनों, महामारी के दौर में मानव मनोविज्ञान और समाज में बदलती संवेदनाओं पर विचारपूर्ण लेख प्रस्तुत किए हैं।

इसी प्रकार “निर्भयें” स्त्री साहस और आत्मसम्मान की प्रेरक कहानियों का संग्रह है। यह कृति बताती है कि स्त्री यदि अपने भीतर के साहस को पहचान ले, तो वह किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकती है। अंग्रेज़ी निबंध संग्रह “Fearless” में भी उन्होंने भारतीय स्त्री जीवन की शक्ति और संघर्ष को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत किया है।

लघुकथा संग्रह “आँचल की चुप्पी” स्त्री मन की सूक्ष्म संवेदनाओं को बहुत मार्मिक ढंग से सामने लाता है। वहीं “खिड़की से झांकती ज़िंदगी” रोज़मर्रा के जीवन के अनुभवों को संवेदनशील दृष्टि से देखने का प्रयास है। इन सभी कृतियों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया है कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला माध्यम भी है।

डॉ. प्रियंका सौरभ की लेखनी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे समाज के उन विषयों को भी उठाती हैं जिन पर अक्सर कम चर्चा होती है। वे दिव्यांग बच्चों की समस्याओं, बुज़ुर्गों की उपेक्षा, शिक्षकों के मानसिक दबाव और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता जैसे विषयों पर गंभीरता से लिखती हैं। उनकी रचनाएँ पाठकों को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।

उनकी साहित्यिक यात्रा में अब तक दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में उनके दस हजार से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। यह संख्या केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उनके निरंतर लेखन और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

साहित्य और समाज के क्षेत्र में उनके योगदान को अनेक संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। उन्हें आईपीएस मानव पुरस्कार, नारी रत्न, सुपर वुमन अवार्ड तथा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। हालांकि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का विश्वास और प्रेम है।

डॉ. प्रियंका सौरभ का जीवन यह सिखाता है कि संघर्ष जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत हो सकता है। यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हो और निरंतर प्रयास करता रहे, तो कोई भी बाधा उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

आज जब समाज तेजी से बदल रहा है और जीवन की भागदौड़ में संवेदनाएँ कहीं खोती हुई दिखाई देती हैं, ऐसे समय में उनकी लेखनी हमें मानवीय मूल्यों की याद दिलाती है। वे यह संदेश देती हैं कि जीवन की सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने में भी होती है।

महिला दिवस के इस विशेष अवसर पर डॉ. प्रियंका सौरभ की यह यात्रा हमें यह प्रेरणा देती है कि स्त्री यदि अपने भीतर की शक्ति को पहचान ले, तो वह अपने जीवन की दिशा स्वयं तय कर सकती है। वह केवल अपने परिवार का आधार ही नहीं, बल्कि समाज की चेतना भी बन सकती है।

उनकी कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि सपने परिस्थितियों के मोहताज नहीं होते। यदि मन में दृढ़ संकल्प हो और प्रयास निरंतर हो, तो हर सपना एक दिन साकार हो सकता है।

डॉ. प्रियंका सौरभ की यह यात्रा न केवल एक स्त्री की उपलब्धि की कहानी है, बल्कि उन सभी महिलाओं के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है जो घर और समाज की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जीवित रखती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान और सबसे बड़ी प्रेरणा है।

( ; सेवानिवृत्त प्राचार्य, शैक्षिक स्तंभकार एवं प्रख्यात शिक्षाविद, मलोट, पंजाब )

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