मां मंदाकिनी को मूल स्वरूप में बनाए रखने हेतु दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा वेबीनार का आयोजन

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, चित्रकूट : दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय निदेशालय भोपाल के सहयोग से मंगलवार को मां मंदाकिनी नदी के पुनर्जीवन, सीवेज प्रबंधन एवं पारिस्थितिक पुनर्स्थापन हेतु प्रस्तावित कार्य योजना सम्बन्धित बैठक का वर्चुअली आयोजन किया गया।

कार्यशाला का शुभारंभ दीनदयाल शोध संस्थान के राष्ट्रीय संगठन सचिव अभय महाजन के स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ। जिसमें उन्होंने कहा कि चित्रकूट के मूल स्वरूप को बनाये रखते हुए इसके विकास हेतु जनता की पहल एवं पुरूषार्थ तथा शासकीय व सामाजिक संगठनों के सामूहिक प्रयत्न से बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा कि नानाजी का हमेशा से ध्येय रहा है कि जनता की पहल और पुरुषार्थ से जो भी काम होता है हमेशा टिकाऊ होता है, नानाजी ने ढ़ाई दशक पूर्व पानी को लेकर काफी कुछ काम जन भागीदारी से करके दिखाया है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय निदेशालय भोपाल के निदेशक डॉ अजीत कुमार विद्यार्थी ने वेबीनार का संयोजन करते हुए कहा कि मां मंदाकिनी को सदानीरा बनाने हेतु पूर्व में जो कार्यशाला और चिंतन हुआ है उसके आधार पर जो प्रमुख बातें निकलकर आई उनमें पवित्र कामदगिरि पहाड़ी का पुनर्स्थापन, पैसुनी- मंदाकिनी नदी तंत्र का जलागम प्रबंधन, बाढ़ प्रबंधन, क्षतिग्रस्त वन पारिस्थितिकी तंत्र का पारिस्थितिक पुनर्स्थापन, सीवेज का इन-सीटू उपचार (स्थल पर उपचार), सीवेज प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर क्रियान्वयन के लिए वैज्ञानिक तरीके से जो कार्य योजना तैयार की गई है इसका प्रस्तुतिकरण विशेषज्ञों के समक्ष रखा गया‌।

इस अवसर पर प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रो सी. आर. बाबू ने मां मंदाकिनी नदी को कैसे सदानीरा बना सके और श्री कामतानाथ के स्थल को कैसे मूल स्वरूप में बनाए रखें इसके लिए उन्होंने अपनी जो विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की है उसका सभी विशेषज्ञों के समस्त प्रस्तुतीकरण उनके द्वारा किया गया।

इस मौके पर सतना कलेक्टर सतीश कुमार एस ने कहा कि जब भी चित्रकूट की बात होती है तो जन सामान्यतः पहाड़, जंगल और मंदाकिनी यह तीन प्रमुख विषय निकलकर आते है जिस पर प्रमुखता से कार्य करने की जरूरत है, इस संदर्भ में उन्होंने नगर परिषद के साथ-साथ संबंधित विभागों को निर्देशित करते हुए विशेषज्ञों की रिपोर्ट को ध्यान में रखकर प्रभावी क्रियान्वयन की बात कही।

इस दौरान भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (IGFRI) झाँसी के डाॅ अरुण शुक्ला द्वारा प्रस्तुतीकरण किया गया‌। केन्द्रीय भूजल बोर्ड भोपाल तथा मध्य प्रदेश परियोजना विकास कारपोरेशन द्वारा भी प्रस्तुतीकरण किया गया‌। इसके अलावा अन्य संबंधित विशेषज्ञों द्वारा भी कार्य योजना पर विचार विमर्श हुआ‌।

इस वर्चुअल कार्यशाला में सतना के जिला वन अधिकारी मयंक चांदीवाल एवं नगर परिषद चित्रकूट के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अंकित सोनी ने भी अपने विचारों को रखा।

कार्यशाला के अंत में समारोप उद्बोधन और आभार व्यक्त करते हुए डीआरआई के कोषाध्यक्ष वसंत पंडित ने कहा कि पैसुनी उद्गम स्थल से लेकर चित्रकूट की मुख्य धारा तक का लगभग 60 प्रतिशत भू-भाग वन विभाग के अन्तर्गत है, फोरेस्ट डिपार्टमेंट के पास फंडिंग की भी कमी नहीं है इसलिए वन विभाग को प्रमुख क्रियान्वयन एजेंसी बनाकर कार्य हो तो बेहतर परिणाम मिल सकेंगे। उन्होंने कहा कि चित्रकूट एक अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक क्षेत्र है, अपनी जीवनरेखा माँ मंदाकिनी नदी के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन तथा नदी की पारिस्थितिकी चुनौतियों के समाधान हेतु एक समन्वित, बहु-क्षेत्रीय एवं कार्यान्वयन-उन्मुख दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

इस अवसर पर दीनदयाल शोध संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिल्ली अमिताभ वशिष्ठ एवं महाप्रबंधक डॉ अनिल जायसवाल सहित कार्यकारी एजेंसियों के एक्सपर्ट प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

विशेषज्ञों द्वारा सुझाएं प्रमुख बिंदु:

कामदगिरि पहाड़ी का अधिकांश भाग बंजर है; वनस्पति केवल ऊपरी भाग तक सीमित है। पहाड़ी का लगभग 2/3 भाग अत्यधिक क्षरित है, जहाँ अवसादी चट्टानें खुली अवस्था में दिखाई देती हैं। विकसित मृदा परत का अभाव है; सतह ढीली चट्टानों एवं पत्थरों से आच्छादित है। इसके लिए भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान झाँसी एवं केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर द्वारा परामर्शदाता मोड में कार्यान्वयन किया जाएगा।

पैसुनी नदी के प्रवाह क्षेत्र में भूमिगत जल भंडारण तंत्र का आकलन करने हेतु हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन किया जाए और इसका ड्रोन सर्वेक्षण, उपग्रह चित्रों एवं भौतिक सर्वेक्षण के माध्यम से पठार, विस्तृत एवं उथली घाटियाँ, संकरी एवं गहरी पाटियाँ, प्रमुख एवं गौण नाले/जलधाराएँ, सतही अपवाह नालियाँ, वन क्षेत्र का सूचीकरण किया जाए। इसके साथ ब्रह्म कुण्ड का पुनर्जीवन किया जाए। यह गतिविधियाँ स्थानीय जनजातीय समुदायों की सहभागिता से संचालित की जाएँ।

नदी बेसिन में वर्षा जल संचयन संरचनाओं का विकास, घाटियों के खुले भाग में मिट्टी की मेड़बंदी करके विस्तृत एवं उथली तथा संकरी एवं गहरी घाटियों में जलाशयों का विकास किया जाए। ये जलाशय जलग्रहण क्षेत्र से आने वाले अपवाह जल का संचयन करेंगे, वाष्पीकरण के माध्यम से सतही तापमान को नियंत्रित करने में सहायता करेंगे तथा डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में बाढ़ की तीव्रता को कम करेंगे। इससे जनजातीय समुदायों की जल सुरक्षा को समर्थन मिलेगा तथा ढालों पर वनस्पति आवरण के विकास को बढ़ावा मिलेगा।

मृदा से आच्छादित पठारी क्षेत्रों, समतल भू-भागों एवं प्रमुख नालों के किनारे तालाबों एवं रिचार्ज पिट्स का निर्माण किया जाए तथा सतही अपवाह जल को इन संरचनाओं की ओर प्रवाहित किया जाए। वर्षा जल के संचयन हेतु प्रमुख नालों पर लघु अवरोधक बाँध निर्मित किए जाएँ। वाष्पीकरण में कमी लाने के लिए घाटी जलाशयों, तालाबों एवं रिचार्ज पिट्स के तटबंधों पर जामुन, अर्जुन, विटेक्स) और डालबर्गिया पौधों का रोपण किया जाए।

हनुमानधारा तथा यूनियन बैंक के पीछे स्थित सामुदायिक सेप्टिक टैंकों पर विकेन्द्रीकृत सीवेज उपचार प्रणालियां स्थापित की जाएँ, ताकि अपशिष्ट जल द्वारा भूजल एवं मंदाकिनी नदी के प्रदूषण को रोका जा सके। बाढ़ की परिस्थितियों में भी प्रभावी संचालन सुनिश्चित करने हेतु सीवर नेटवर्क को सुदृढ़ किया जाए।

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