सेवा ही सहारा : इण्डियन हेल्पलाइन सोसाइटी की बृज की रसोई पहुँची आग से उजड़े परिवारों के बीच

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ : प्रेरणास्रोत बाबा नीम करौली जी की कृपा से इण्डियन हेल्पलाइन सोसाइटी (पंजीकृत) द्वारा संचालित बृज की रसोई ने अपनी साप्ताहिक सेवा परंपरा को निभाते हुए इस रविवार विकासनगर अग्निकांड से प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचकर छोले-चावल का वितरण किया। हर रविवार चलने वाली यह सेवा इस बार उन घरों तक पहुँची, जहाँ आग की विभीषिका ने जीवन की बुनियाद को ही झकझोर दिया था।

संस्था के सदस्य संजय श्रीवास्तव ने बताया कि सेवा का यह कारवां हर सप्ताह की तरह आगे बढ़ा, लेकिन इस बार इसकी मंज़िल वे परिवार थे, जिन्होंने एक ही पल में अपना सब कुछ खो दिया। अनुराग दुबे ने कहा कि स्वयंसेवकों ने सिर्फ भोजन ही नहीं बांटा, बल्कि पीड़ितों के बीच बैठकर उनका हाल-चाल जाना और उन्हें अपनापन महसूस कराया।

आशीष श्रीवास्तव ने जानकारी दी कि जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित इस सेवा में लगभग 2000 जरूरतमंदों को स्वच्छ एवं पौष्टिक भोजन वितरित किया गया। यह सहयोग उनके लिए केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि कठिन समय में मिला एक भावनात्मक सहारा भी बना।

विकास पाण्डेय ने बताया कि स्वयंसेवकों द्वारा परोसा गया हर कौर मानो यह संदेश दे रहा था कि पीड़ित परिवार अकेले नहीं हैं। बच्चों की हल्की मुस्कान, बुजुर्गों की नम आँखों में झलकता आभार और पूरे वातावरण में फैली संवेदनाएं इस सेवा की सच्ची तस्वीर बन गईं।

संस्थापक विपिन शर्मा ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि विकासनगर में जिन परिवारों ने एक ही पल में अपना घर, सामान और यादें खो दीं, उनके दर्द को महसूस करना अत्यंत पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि कई ज़िंदगियों की बदली हुई कहानी है। ऐसे समय में संस्था का उद्देश्य सिर्फ भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि हर पीड़ित तक यह विश्वास पहुँचाना है कि वे इस कठिन घड़ी में अकेले नहीं हैं।

उन्होंने यह भी दोहराया कि  इण्डियन हेल्पलाइन सोसाइटी हर संभव रूप में पीड़ितों के साथ खड़ी रहेगी—एक सहारे की तरह, एक अपने की तरह। इस सेवा कार्य में सी.एच. तिवारी, जालिम सिंह, संजय श्रीवास्तव, विकास पाण्डेय, आशीष श्रीवास्तव, अनुराग दुबे, विशाल सक्सेना, अखिलेश सिंह, गोविन्द सिंह, ध्रुव सक्सेना एवं सविता निगम, गीता प्रजापति, सरस्वती विश्वास, शीला सिंह सहित अनेक स्वयंसेवकों की सक्रिय सहभागिता रही।

अंततः यह सेवा एक बार फिर यह साबित कर गई कि जब इंसानियत साथ खड़ी होती है, तो सबसे बड़ा दर्द भी थोड़ा हल्का हो जाता है।

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