जो लौट के घर ना आये : शहीद हवलदार मान सिंह यादव

जय सिंह यादव, रायबरेली : कारगिल के बटालिक सेक्टर की गगनचुम्बी पहाड़ियां, माइनस 20 डिग्री से नीचे का तापमान, खड़ी चढ़ाई, आसमान से पाकिस्तानी तोपखाने के बरसते गोले, सामने से छोटे हथियारों से की जा रही भीषण फायरिंग । इन तमाम बाधाओं के बीच आगे बढ़ते भारतीय सेना के वीर जवान, जिनके साहस को न तो मौत डिगा पा रही थी और ना ही भूख, प्यास और थकान । बस एक निश्चित लक्ष्य – अपनी मातृभूमि से पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भागना । यह था 1999 में लड़ा गया ऑपरेशन विजय (कारगिल) ।

ऑपरेशन विजय के दौरान 5 पैरा विशेष बल बटालिक सेक्टर में तैनात थी । हवलदार मान सिंह  यादव अपनी यूनिट की एक प्लाटून के लाइट मशीन गन  डिटैचमेंट कमांडर थे। 24 जुलाई को इस प्लाटून को नियंत्रण रेखा के साथ लगती एक सामरिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण पहाड़ी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी । इस महत्वपूर्ण पहाड़ी से दुश्मन को भागना जरुरी था । इस पहाड़ी के सामरिक महत्व को देखते हुए दुश्मन की ओर से इस पहाड़ी पर तोपखाने से भीषण बमबारी को जा रही थी । हवलदार मान सिंह यादव अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपनी लाइट मशीन गन  डिटैचमेंट के साथ आगे बढे और अपनी लाइट मशीन गन को तेजी से आड़ में लगा दिया और इस स्थान से उन्होंने लगातार दुश्मन पर प्रभावी गोलीबारी की, जिससे दुश्मन को भारी नुकसान हुआ । प्रभावी गोलीबारी के कारण दुश्मन का लिंक रूट जिससे दुश्मन आगे बढ़ रहा था, वह अवरुद्ध हो गया । इस वीरतापूर्ण कार्यवाही  के दौरान हवलदार मान सिंह  यादव  दुश्मन के तोपखाने की फायरिंग की चपेट में आ गए । दुश्मन के तोपखाने के गोले का  स्प्लिंडर  उन्हें जा लगा जिससे वह घायल हो गए और गहरी चोटों और तीव्र रक्तस्राव के कारण वह वीरगति को प्राप्त  हो गए। 

हवलदार मान सिंह यादव का जन्म जनपद सुल्तानपुर के गांव हयात नगर में 10 जुलाई 1965 को हुआ था। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात वह 15 मार्च 1985 को भारतीय सेना की 5 पैरा विशेष बल में शामिल हुए। उन्होंने ऑपरेशन विजय के अलावा ऑपरेशन पवन (श्री लंका), ऑपरेशन आर्चिड और ऑपरेशन मेघदूत में भी सक्रिय भाग लिया था ।

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