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	<title>सम्पादकीय Archives - Suryoday Bharat</title>
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	<description>Hindi News Agency</description>
	<lastBuildDate>Sat, 25 Apr 2026 16:28:35 +0000</lastBuildDate>
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		<title>प्रदेश सरकार के सफल प्रयासों से गोसंरक्षण के साथ-साथ आर्थिक स्वावलम्बन का आधार बन रही गौशालाएं : निधि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Apr 2026 16:27:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>निधि वर्मा, सूचना अधिकारी, लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मा0 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व एवं कुशल दिशा-निर्देशन में पिछले नौ वर्षों में प्रदेश में भारतीय संस्कृति की आस्था के प्रतीक गौवंश के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए उल्लेखनीय कार्य राज्य सरकार द्वारा किये गये हैं। पूर्ववर्ती सरकारों के समय उत्तर प्रदेश में निराश्रित &#8230;</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="1024" height="682" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/04/WhatsApp-Image-2026-04-25-at-21.56.34-1024x682.jpeg" alt="" class="wp-image-310493" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">निधि वर्मा, सूचना अधिकारी, लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मा0 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व एवं कुशल दिशा-निर्देशन में पिछले नौ वर्षों में प्रदेश में भारतीय संस्कृति की आस्था के प्रतीक गौवंश के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए उल्लेखनीय कार्य राज्य सरकार द्वारा किये गये हैं। पूर्ववर्ती सरकारों के समय उत्तर प्रदेश में निराश्रित गोवंश की समस्या लंबे समय तक किसानों, ग्रामीण समाज और शहरी जीवन के लिए एक गंभीर चुनौती बनी रही। खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान, सड़कों पर दुर्घटनाओं का खतरा और पशुओं की दयनीय स्थिति को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से जुड़े मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए प्रदेश में गोवंश संवर्धन तथा निराश्रित बेसहारा छुट्टा गोवंश के संरक्षण एवं भरण-पोषण के उद्देश्य से निराश्रित गोवंश संरक्षण नीति-2019 का प्राख्यापन कर समस्त निराश्रित गोवंश संरक्षण का कार्य प्रथम बार किया गया है। आज यह नीति जमीनी स्तर पर सकारात्मक परिणाम दे रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गोवंश का संरक्षण एवं संवर्धन प्रदेश सरकार की प्राथमिकता है और इस हेतु प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 6,433 अस्थायी गो आश्रय स्थल, 518 वृहद गो संरक्षण केंद्र और 253 कांजी हाउस संचालित किए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त शहरी क्षेत्रों में 323 कान्हा गो आश्रय स्थल स्थापित किए गए हैं। इस प्रकार पूरे प्रदेश में कुल 7,527 गो आश्रय स्थलों का एक सुदृढ़ नेटवर्क विकसित किया गया है, जिसमें लगभग 12.39 लाख निराश्रित गोवंश सुरक्षित रूप से संरक्षित किए जा रहे हैं। सरकार द्वारा प्रति गोवंश प्रतिदिन 50 रूपये की धनराशि दी जा रही है। प्रदेश सरकार ने गोवंश की चुनौती को व्यापक स्तर पर स्वीकार करते हुए ठोस व्यवस्थाओं का विकास करके गौवंश संरक्षण किया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गो आश्रय स्थलों के संचालन और गोवंश के भरण-पोषण के लिए प्रदेश सरकार द्वारा प्रतिदिन लगभग 7.50 करोड़ रुपये की धनराशि व्यय की जा रही है। यह व्यय पशु संरक्षण, किसान सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दीर्घकालिक निवेश है। सरकार की यह प्रतिबद्धता स्पष्ट करती है कि गोवंश संरक्षण को एक मानवीय और सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में प्राथमिकता दी जा रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस अभियान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ “मा0 मुख्यमंत्री सहभागिता योजना” है। इस योजना के अंतर्गत अब तक 1,14,481 इच्छुक लाभार्थियों को 1,83,389 निराश्रित गोवंश सुपुर्द किए जा चुके हैं। इससे गोवंश को स्थायी आश्रय मिलने के साथ-साथ पशुपालकों की आय में भी वृद्धि हो रही है। गोवंश संरक्षण हेतु सेन्ट्रल प्रोजेक्ट मानिटरिंग यूनिट की स्थापना की गयी है, जिससे निराश्रित गोवंश आदि का अनुश्रवण किया जा रहा है एवं डी०बी०टी० के माध्यम से भरण पोषण की धनराशि सीधे गो आश्रय स्थलों को तथा सहभागियों के खाते में अन्तरित की जा रही है। यह योजना आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में एक प्रभावी पहल साबित हो रही है, जिसमें संरक्षण और आजीविका-दोनों का संतुलन दिखाई देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रदेश में गो संरक्षण केंद्रों के निर्माण को भी प्राथमिकता दी गई है। अब तक 630 वृहद गो संरक्षण केंद्रों के निर्माण की स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है, जिनमें से 539 केंद्रों का निर्माण पूर्ण हो चुका है और 518 केंद्रों को क्रियाशील किया जा चुका है। प्रत्येक वृहद गो संरक्षण केंद्र में लगभग 400 गोवंश को रखने की क्षमता निर्धारित की गई है, तथा प्रति केंद्र निर्माण लागत लगभग 160.12 लाख रुपये है। इसके अतिरिक्त वित्तीय वर्ष 2026-27 में नए वृहद गो संरक्षण केंद्रों के निर्माण हेतु 100.00 करोड़ रुपये की धनराशि का प्रावधान किया गया है। प्रदेश सरकार इस दिशा में निरंतर विस्तार और सुदृढ़ीकरण पर कार्य कर रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गोवंश संरक्षण के इन प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव अब कृषि क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। गो आश्रय स्थलों में पशुओं के व्यवस्थित संरक्षण के कारण खेतों में फसलों को होने वाले नुकसान में भारी कमी आई है। गो आश्रय स्थलों से निकलने वाले गोबर का उपयोग खाद का उपयोग करके प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है और प्रदेश में अन्न उत्पादन में भी निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यह पहल किसानों के लिए राहत का एक मजबूत आधार बनकर उभरी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गोवंश के भरण-पोषण को सुनिश्चित करने के लिए “भूसा-संग्रहण अभियान” एक महत्वपूर्ण कदम है। 15 अप्रैल 2026 से 31 मई 2026 तक चलाए जा रहे इस अभियान के तहत 60.99 लाख कुंतल भूसा संग्रह का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अब तक दान के माध्यम से 0.598 लाख कुंतल तथा क्रय के माध्यम से 5.02 लाख कुंतल भूसा संग्रहित किया जा चुका है। यह अभियान न केवल चारे की उपलब्धता सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि समाज में सहयोग और सहभागिता की भावना को भी सुदृढ़ कर रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके साथ ही, गो आश्रय स्थलों में संरक्षित गोवंश को नियमित रूप से हरा चारा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चारागाह भूमि का विकास भी किया जा रहा है। प्रदेश में उपलब्ध 61,118.85 हेक्टेयर गोचर/चारागाह भूमि में से 11,834.50 हेक्टेयर भूमि को 7,339 गो आश्रय स्थलों से संबद्ध किया गया है। अब तक 7,364.03 हेक्टेयर भूमि पर हरे चारे की बुवाई की जा चुकी है। यह प्रयास गोवंश के पोषण स्तर को बेहतर बनाने के साथ-साथ आश्रय स्थलों की आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा दे रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सरकार का दृष्टिकोण केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि गो आश्रय स्थलों को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित करना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। पशुपालन विभाग द्वारा गो आश्रय स्थलों को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से गोबर पेंट, गो दीप, धूपबत्ती, गो लठा, गोबर के गमले, वर्मी कम्पोस्ट तथा जैविक उत्पाद इकाइयों की स्थापना की जा रही है। इन इकाइयों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी इस पहल को और अधिक सशक्त बना रही है। ये समूह गो आधारित उत्पादों के निर्माण और विपणन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनने का अवसर मिल रहा है। यह पहल महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ ग्रामीण सामाजिक संरचना को मजबूत करने में भी सहायक सिद्ध हो रही है</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रदेश सरकार के अतुलनीय और नवीन प्रयासों ने निराश्रित गोवंश की समस्या को एक अवसर में परिवर्तित कर दिया है। जहां एक तरफ गोआश्रय स्थलों के माध्यम से निराश्रित गोवंश का संरक्षण हो रहा है। वहीं सरकार गोआश्रय स्थलों को आत्मनिर्भर बनाने, स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने, महिलाओं को सशक्त करने और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सतत प्रयत्नशील है। निश्चित ही गोवंश संरक्षण की दिशा में उ0प्र0 सरकार की यह पहल प्रशंसनीय और देश के अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय है।</p>
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		<title>मोदी के बाद की बीजेपी : डॉ. अतुल मलिकराम</title>
		<link>https://suryodaybharat.com/bjp-after-modi-dr-atul-malikram/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 12:50:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर को यदि मोदी युग कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में न केवल देश की सत्ता संभाली, बल्कि राजनीति के व्याकरण को ही बदल दिया। गुजरात के वडनगर की साधारण गलियों से निकलकर विश्व पटल पर छा जाने वाले मोदी का सफर &#8230;</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="1024" height="576" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/04/WhatsApp-Image-2026-04-18-at-16.51.45-1024x576.jpeg" alt="" class="wp-image-310131" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर को यदि मोदी युग कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में न केवल देश की सत्ता संभाली, बल्कि राजनीति के व्याकरण को ही बदल दिया। गुजरात के वडनगर की साधारण गलियों से निकलकर विश्व पटल पर छा जाने वाले मोदी का सफर संघर्ष और दूरदर्शिता की एक अनूठी कहानी है। लेकिन साल 2026 में खड़े होकर जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो एक बड़ा सवाल राजनीतिक गलियारों में गूँजता दिखाई देता है कि आखिर मोदी के बाद बीजेपी का क्या होगा? क्या यह पार्टी अपने इस सबसे बड़े चेहरे के बिना भी उसी मजबूती से खड़ी रह पाएगी? यह प्रश्न केवल राजनीतिक विश्लेषकों के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो भारतीय लोकतंत्र की बदलती दिशा को समझना चाहता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सिर्फ चुनावी आंकड़ों या नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनता के सीधे जुड़ाव और उनके भरोसे पर टिकी है। मोदी ने एक संगठन कार्यकर्ता के रूप में जमीन पर रहकर उन समस्याओं को महसूस किया है, जो एक आम आदमी रोज झेलता है। यही कारण है कि उनकी नीतियां किताबी होने के बजाय व्यावहारिक नजर आती हैं। 2014 में जब उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तब देश में निराशा का माहौल था। जैसा कि बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने हाल ही में गांधीनगर की एक समिट में जिक्र किया था कि 2012-13 के दौरान युवा और व्यापार जगत दोनों ही भविष्य को लेकर असुरक्षित थे। मोदी ने स्टार्टअप इंडिया और स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों के जरिए इस माहौल को बदला। उन्होंने 140 करोड़ देशवासियों को देश की सबसे बड़ी संपत्ति मानकर &#8216;सबका साथ, सबका विकास&#8217; का मंत्र दिया, जिसका असर आज देश के बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था में साफ दिखाई देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तथ्यों की बात करें, तो मोदी के नेतृत्व में भारत ने ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस और वाइब्रेंट गुजरात जैसे मॉडलों को पूरे देश में लागू किया। आज भारत केवल घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे वैश्विक मंचों पर भी अपनी भूमिका तय कर रहा है। ग्रामीण भारत से लेकर मुंबई और पुणे जैसे महानगरों तक, बीजेपी की चुनावी जीत मोदी के प्रति लोगों के अटूट विश्वास का प्रमाण है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी की सफलता यह साबित करती है कि मोदी का प्रभाव केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के हर कोने में मतदाता उनके विकास कार्यों पर मुहर लगा रहा है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी भी इसी बात को दोहराते हैं कि यह जीत मोदी के प्रति बढ़ती स्वीकार्यता का ही नतीजा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी केवल मोदी के सहारे चलने वाली पार्टी है? इस सवाल का जवाब पार्टी के भीतर छिपी उसकी संगठनात्मक गहराई में मिलता है। बीजेपी की सबसे बड़ी खूबी उसका वह मजबूत ढांचा है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की विरासत पर टिका है। आरएसएस का विशाल कार्यकर्ता नेटवर्क बीजेपी को वह जमीनी ताकत देता है, जो शायद ही दुनिया के किसी अन्य दल के पास हो। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के रूप में जो क्षेत्रीय समन्वय बैठकें चल रही हैं, वे इसी ताकत का सबूत हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में होने वाली ये बैठकें यह सुनिश्चित कर रही हैं कि सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच कोई दूरी न रहे। अवध से लेकर गोरखपुर और पश्चिम यूपी तक फैला यह नेटवर्क ही पार्टी की असली रीढ़ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बीजेपी ने समय की मांग को समझते हुए भविष्य के नेतृत्व पर भी काम शुरू कर दिया है। 45 वर्षीय नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी अब युवा ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना चाहती है। इसे बीजेपी में एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है, जो &#8216;विकसित भारत 2047&#8217; के लक्ष्य को लेकर गंभीर है। सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्यों में भी योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा और देवेंद्र फडणवीस जैसे मजबूत चेहरे तैयार किए गए हैं। यह तथ्य कि बीजेपी वर्तमान में 21 राज्यों में सत्ता में है, यह दर्शाता है कि पार्टी के पास नेतृत्व की एक लंबी और प्रभावशाली कतार है, जो केवल एक व्यक्ति पर केंद्रित नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बेशक, मोदी के सक्रिय राजनीति से हटने पर बीजेपी के सामने कुछ चुनौतियां जरूर आएंगी। एक करिश्माई नेता की कमी हमेशा खलती है और कुछ वोट ऐसे जरूर होते हैं जो केवल मोदी के नाम पर पार्टी से जुड़ते हैं। विपक्षी दल भी इस खालीपन का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। हालांकि, पार्टी की विचारधारा राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और अंत्योदय, ऐसी जड़ें हैं जो नेतृत्व परिवर्तन के दौरान भी संगठन को बांधे रखती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी का वोट शेयर स्थिर है, जिसका मतलब है कि जनता केवल चेहरे को नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यशैली और विचारधारा को भी समर्थन दे रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुल मिलाकर देखें तो नरेंद्र मोदी के बिना बीजेपी का भविष्य अंधकारमय नहीं है। मोदी ने पार्टी को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया है, वहां से आगे जाने के लिए संगठन के पास एक स्पष्ट रोडमैप और मजबूत कार्यकर्ता शक्ति है। यूपी में तीन-स्तरीय समन्वय रणनीति और युवा नेतृत्व को दी जा रही तवज्जो इस बात का प्रमाण है कि पार्टी भविष्य के लिए पूरी तरह तैयार है। नेतृत्व का रूप बदल सकता है, लेकिन बीजेपी की वैचारिक दिशा और विकास का संकल्प वही रहने वाला है। जैसा कि कई राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं, बीजेपी के भीतर अब हजारों मोदी तैयार हो चुके हैं, जो उनके द्वारा शुरू किए गए कार्यों को आगे ले जाने में सक्षम हैं। यही संगठनात्मक जीवंतता बीजेपी को मोदी के बाद भी भारतीय राजनीति का केंद्र बनाए रखेगी।</p>
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		<title>पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 16:05:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[प्रदेश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>डॉ. अतुल मलिकराम : आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह है &#8230;</p>
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<figure class="wp-block-image size-large is-style-default"><img decoding="async" width="1024" height="576" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/03/WhatsApp-Image-2026-03-11-at-18.48.07-1024x576.jpeg" alt="" class="wp-image-308114" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉ. अतुल मलिकराम :</strong> आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह है क्या? और इसका हमसे क्या संबंध है? सरल शब्दों में समझें तो कार्बन क्रेडिट एक तरह का प्रमाण-पत्र है। जब कोई देश, कंपनी या परियोजना वातावरण में जाने वाले कार्बन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषण को एक टन कम करती है, तो उसे एक कार्बन क्रेडिट मिलता है। इस व्यवस्था की शुरुआत 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल से हुई और 2015 के पेरिस समझौते के बाद यह और व्यापक हो गई। इसका मूल सिद्धांत सीधा है जो प्रदूषण कम करे, उसे आर्थिक लाभ मिले; जो ज्यादा प्रदूषण करे, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़े।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज यह केवल पर्यावरण की चर्चा नहीं रह गई है, बल्कि एक वैश्विक बाजार बन चुका है। दुनिया के कई देश अपने व्यापार नियमों में बदलाव कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ ने &#8216;कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट&#8217; जैसी व्यवस्था लागू करनी शुरू की है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी देश में उत्पादन के दौरान अधिक प्रदूषण होता है, तो उसके उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। आने वाले समय में भारतीय उद्योगों को भी यह साबित करना होगा कि उनका उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यहाँ से कार्बन क्रेडिट का आर्थिक और राजनीतिक महत्व शुरू होता है। भारत लंबे समय से यह कहता आया है कि ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों ने सबसे अधिक प्रदूषण किया है, इसलिए विकासशील देशों पर समान बोझ डालना न्यायसंगत नहीं है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था &#8216;ग्रीन&#8217; यानी पर्यावरण-अनुकूल दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में भारत के लिए कार्बन क्रेडिट को अवसर के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सबसे पहले बात करें किसानों की। खेती जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होती है, लेकिन यही क्षेत्र नई आय का स्रोत भी बन सकता है। यदि किसान ड्रिप सिंचाई अपनाते हैं, फसल अवशेष नहीं जलाते, जैविक खाद का उपयोग बढ़ाते हैं, मिट्टी में कार्बन सुरक्षित रखने वाली पद्धतियाँ अपनाते हैं या सोलर पंप लगाते हैं तो वे कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं। इससे उनकी आय केवल फसल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के बदले अतिरिक्त कमाई भी होगी। सही नीति और पारदर्शी व्यवस्था हो तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा बड़ा क्षेत्र एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग है। यह क्षेत्र देश के रोजगार और निर्यात की रीढ़ है। यदि छोटे उद्योग ऊर्जा-कुशल मशीनें अपनाएँ, सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग करें और उत्पादन प्रक्रिया में प्रदूषण कम करें, तो उन्हें दोहरा लाभ मिलेगा, एक तरफ ऊर्जा लागत घटेगी, दूसरी तरफ कार्बन क्रेडिट के रूप में अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा। आज वैश्विक खरीदार भी &#8216;ग्रीन सप्लाई चेन&#8217; को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में भारतीय उद्योगों के लिए यह प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का व्यावहारिक मार्ग है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरे स्तर पर सरकारों की भूमिका अहम है। भारत के विभिन्न राज्यों के पास अलग-अलग प्राकृतिक संसाधन हैं, कहीं घने जंगल, कहीं तेज हवाएँ तो कहीं सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। यदि राज्य अपने संसाधनों के आधार पर कार्बन परियोजनाएँ विकसित करें, तो वे राजस्व का नया स्रोत बना सकते हैं। केंद्र सरकार के लिए एक पारदर्शी और मजबूत राष्ट्रीय कार्बन बाजार विकसित करना रणनीतिक रूप से आवश्यक है। इससे भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करते हुए वैश्विक कार्बन फाइनेंस में महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कॉर्पोरेट क्षेत्र और निवेशकों के लिए भी यह एक बड़ा अवसर है। दुनिया भर में ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक जिम्मेदारी और सुशासन) आधारित निवेश तेजी से बढ़ रहा है। जो कंपनियाँ अपने उत्सर्जन कम करती हैं और कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करती हैं, वे निवेशकों की पहली पसंद बन रही हैं। यह केवल छवि सुधारने का साधन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता की रणनीति है। युवा पीढ़ी के लिए भी यह क्षेत्र नए अवसर खोल रहा है। कार्बन अकाउंटिंग, पर्यावरण ऑडिट, सस्टेनेबिलिटी सलाहकार, कार्बन बाजार विश्लेषण जैसे पेशे आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेंगे। टेक्नोलॉजी आधारित स्टार्टअप भी इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत की स्थिति इस संदर्भ में मजबूत है। हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में कम है। हमारे पास सौर ऊर्जा की अपार क्षमता, विस्तृत वन क्षेत्र और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। यदि इन संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो कार्बन क्रेडिट के माध्यम से गांवों में वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेरिस समझौते के तहत भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से 500 गीगावाट ऊर्जा क्षमता और उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं होगा। इसके लिए उद्योग, किसान, निवेशक और आम नागरिक, सभी की भागीदारी आवश्यक है। स्पष्ट है कि कार्बन क्रेडिट केवल पर्यावरण का विषय नहीं है। यह भविष्य की अर्थव्यवस्था, व्यापार नीति और राष्ट्रीय रणनीति से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि भारत इसे दूरदर्शिता, पारदर्शिता और संतुलित नीति के साथ अपनाता है, तो यह हमारे लिए बाध्यता नहीं बल्कि विकास का नया अध्याय बन सकता है।</p>
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		<title>&#8220;महिला दिवस विशेष&#8221; सपनों की उड़ान : शिक्षिका और लेखिका डॉ. प्रियंका सौरभ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 15:01:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="521" height="1024" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/03/WhatsApp-Image-2026-03-06-at-18.20.43-521x1024.jpeg" alt="" class="wp-image-307740" style="width:840px;height:auto" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> डॉ. विजय गर्ग : </strong>समाज के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ स्त्रियों ने सीमित संसाधनों और अनेक सामाजिक बंधनों के बावजूद अपने साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प से जीवन की नई दिशाएँ तय की हैं। स्त्री केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशील चेतना भी है। जब एक स्त्री अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेती है, तो वह केवल अपने जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को प्रेरित करने का सामर्थ्य रखती है। ऐसी ही प्रेरक कहानी है शिक्षिका, लेखिका और संवेदनशील विचारक डॉ. प्रियंका सौरभ की, जिनकी जीवन यात्रा संघर्ष, साधना और सृजन का सुंदर संगम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हरियाणा के हिसार जिले के आर्यनगर गाँव के साधारण ग्रामीण परिवेश में जन्मी डॉ. प्रियंका सौरभ का बचपन सामान्य परिस्थितियों में बीता। उनके जीवन में न तो विशेष संसाधन थे और न ही कोई विशेष सुविधा। लेकिन उनके भीतर शिक्षा प्राप्त करने और जीवन में कुछ सार्थक करने की गहरी इच्छा अवश्य थी। यही इच्छा आगे चलकर उनके संकल्प की शक्ति बन गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनकी शिक्षा-यात्रा के दौरान ही जीवन ने एक बड़ा मोड़ लिया जब स्नातक की पढ़ाई के दौरान उनका विवाह हो गया। विवाह के बाद उनके सामने पत्नी, बहू और बाद में माँ की जिम्मेदारियाँ आ खड़ी हुईं। अक्सर भारतीय समाज में ऐसे अवसर पर लड़कियों की शिक्षा और उनके सपने पीछे छूट जाते हैं। घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ ही उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र बन जाती हैं। लेकिन डॉ. प्रियंका सौरभ ने परिस्थितियों को अपनी सीमाएँ बनने नहीं दिया। उन्होंने अपने जीवन की चुनौतियों को स्वीकार किया, लेकिन अपने सपनों को कभी त्यागा नहीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। यह कार्य आसान नहीं था। सीमित समय, घरेलू कार्यों का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ—इन सबके बीच शिक्षा की राह पर आगे बढ़ना किसी तपस्या से कम नहीं था। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर परिश्रम के बल पर उन्होंने राजनीति विज्ञान में डबल एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने एम.फिल की पढ़ाई पूरी की और आगे पीएच.डी. के शोध कार्य की दिशा में भी निरंतर प्रयासरत रहीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह उस संघर्ष और समर्पण का परिणाम हैं जिसने हर कठिनाई को चुनौती दी। जीवन की इसी निरंतर साधना ने उन्हें सरकारी सेवा के क्षेत्र में भी सफलता दिलाई। पाँच बार सरकारी सेवा में चयनित होना किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह उनके अथक प्रयास, आत्मविश्वास और लक्ष्य के प्रति समर्पण का प्रमाण है। अंततः उन्होंने हरियाणा शिक्षा विभाग में प्रवक्ता के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक शिक्षिका के रूप में डॉ. प्रियंका सौरभ केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने तक सीमित नहीं रहतीं। वे अपने विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और सकारात्मक सोच का बीज बोने का प्रयास करती हैं। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है। वे विद्यार्थियों को यह समझाने का प्रयास करती हैं कि जीवन में सफलता केवल अंकों या डिग्रियों से नहीं मिलती, बल्कि मेहनत, अनुशासन और निरंतर सीखने की इच्छा से मिलती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शिक्षण कार्य के साथ-साथ डॉ. प्रियंका सौरभ ने साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनके लिए लेखन केवल एक शौक नहीं, बल्कि जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जब भी उन्हें समय मिलता, वे अपने अनुभवों, संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को शब्दों में ढालने का प्रयास करतीं। धीरे-धीरे यह प्रयास एक सशक्त साहित्यिक यात्रा में बदल गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनकी रचनाओं में स्त्री जीवन की संवेदनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ, मानवीय संबंधों की जटिलताएँ और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों की गहरी अनुभूति देखने को मिलती है। वे केवल कल्पना के संसार में नहीं रहतीं, बल्कि समाज के वास्तविक अनुभवों को अपनी लेखनी का आधार बनाती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनका काव्य संग्रह “दीमक लगे गुलाब” रिश्तों की उन अदृश्य दरारों को उजागर करता है जो अक्सर दिखाई नहीं देतीं, लेकिन धीरे-धीरे संबंधों को भीतर से कमजोर कर देती हैं। इसी तरह “चूल्हे से चाँद तक” स्त्री जीवन के संघर्ष, सपनों और आकांक्षाओं की यात्रा को दर्शाता है। यह संग्रह बताता है कि स्त्री की दुनिया केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; उसके सपने आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“मौन की मुस्कान” उनकी एक और महत्वपूर्ण कृति है जिसमें उन चुप्पियों को आवाज़ दी गई है जिन्हें स्त्रियाँ अक्सर अपने भीतर ही समेट लेती हैं। यह संग्रह पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि समाज में कितनी ही भावनाएँ और पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें शब्द नहीं मिल पाते।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है। “परियों से संवाद” और “बच्चों की दुनिया” जैसी कृतियाँ बच्चों की कल्पनाशीलता, जिज्ञासा और संवेदनशीलता को अभिव्यक्त करती हैं। इन रचनाओं में बालमन की सहजता और सरलता को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">निबंध लेखन के क्षेत्र में उनका संग्रह “समय की रेत पर” विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें उन्होंने सामाजिक परिवर्तनों, महामारी के दौर में मानव मनोविज्ञान और समाज में बदलती संवेदनाओं पर विचारपूर्ण लेख प्रस्तुत किए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसी प्रकार “निर्भयें” स्त्री साहस और आत्मसम्मान की प्रेरक कहानियों का संग्रह है। यह कृति बताती है कि स्त्री यदि अपने भीतर के साहस को पहचान ले, तो वह किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकती है। अंग्रेज़ी निबंध संग्रह “Fearless” में भी उन्होंने भारतीय स्त्री जीवन की शक्ति और संघर्ष को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत किया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लघुकथा संग्रह “आँचल की चुप्पी” स्त्री मन की सूक्ष्म संवेदनाओं को बहुत मार्मिक ढंग से सामने लाता है। वहीं “खिड़की से झांकती ज़िंदगी” रोज़मर्रा के जीवन के अनुभवों को संवेदनशील दृष्टि से देखने का प्रयास है। इन सभी कृतियों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया है कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला माध्यम भी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. प्रियंका सौरभ की लेखनी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे समाज के उन विषयों को भी उठाती हैं जिन पर अक्सर कम चर्चा होती है। वे दिव्यांग बच्चों की समस्याओं, बुज़ुर्गों की उपेक्षा, शिक्षकों के मानसिक दबाव और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता जैसे विषयों पर गंभीरता से लिखती हैं। उनकी रचनाएँ पाठकों को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनकी साहित्यिक यात्रा में अब तक दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में उनके दस हजार से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। यह संख्या केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उनके निरंतर लेखन और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">साहित्य और समाज के क्षेत्र में उनके योगदान को अनेक संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। उन्हें आईपीएस मानव पुरस्कार, नारी रत्न, सुपर वुमन अवार्ड तथा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। हालांकि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का विश्वास और प्रेम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. प्रियंका सौरभ का जीवन यह सिखाता है कि संघर्ष जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत हो सकता है। यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हो और निरंतर प्रयास करता रहे, तो कोई भी बाधा उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज जब समाज तेजी से बदल रहा है और जीवन की भागदौड़ में संवेदनाएँ कहीं खोती हुई दिखाई देती हैं, ऐसे समय में उनकी लेखनी हमें मानवीय मूल्यों की याद दिलाती है। वे यह संदेश देती हैं कि जीवन की सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने में भी होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">महिला दिवस के इस विशेष अवसर पर डॉ. प्रियंका सौरभ की यह यात्रा हमें यह प्रेरणा देती है कि स्त्री यदि अपने भीतर की शक्ति को पहचान ले, तो वह अपने जीवन की दिशा स्वयं तय कर सकती है। वह केवल अपने परिवार का आधार ही नहीं, बल्कि समाज की चेतना भी बन सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनकी कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि सपने परिस्थितियों के मोहताज नहीं होते। यदि मन में दृढ़ संकल्प हो और प्रयास निरंतर हो, तो हर सपना एक दिन साकार हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. प्रियंका सौरभ की यह यात्रा न केवल एक स्त्री की उपलब्धि की कहानी है, बल्कि उन सभी महिलाओं के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है जो घर और समाज की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जीवित रखती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान और सबसे बड़ी प्रेरणा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">( ; सेवानिवृत्त प्राचार्य, शैक्षिक स्तंभकार एवं प्रख्यात शिक्षाविद, मलोट, पंजाब )</p>
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		<title>अमेरिका से मुक्त व्यापार समझौता : साम्राज्यवाद के आगे लाल गलीचा बिछाकर आत्म-समर्पण</title>
		<link>https://suryodaybharat.com/free-trade-agreement-with-america-surrender-by-rolling-out-the-red-carpet-in-front-of-imperialism/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 09:39:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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		<category><![CDATA[विदेश]]></category>
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<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img decoding="async" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-22-at-11.43.40.jpeg" alt="" class="wp-image-307376" style="width:840px;height:auto" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>वीजू कृष्णन :</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के हुक्म के आगे आत्म-समर्पण कर दिया है और भारत की संप्रभुता से गंभीर रूप से समझौता करते हुए एक अपमानजनक और एक-तरफ़ा व्यापार सौदे के लिए राज़ी हो गए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक-तरफ़ा तौर पर जिस “डील” का ऐलान किया है और जिसका नरेंद्र मोदी ने एक्स पर स्वागत किया है, वह ऐसा लगता है, जैसे हमारे गले को जूते से दबाकर समझौते के लिए बाध्य किया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि भारतीय प्रधानमंत्री रूस से तेल न खरीदने के लिए राज़ी हो गए हैं, बदले में अमेरिका 18% का “कम” पारस्परिक शुल्क लगाएगा, भारत अपने शुल्क को शून्य करेगा और गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करेगा। अपनी घोषणा में ट्रंप ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और कई दूसरे उत्पादों के 500 अरब डॉलर से ज़्यादा की खरीद के अलावा, बहुत ऊँचे स्तर पर “अमेरिका से खरीद&#8221; का वादा किया है। मोदी ने आगे खुशी ज़ाहिर की कि &#8216;मेड इन इंडिया&#8217; उत्पादों पर अब कम शुल्क लगेगा और भारत के 140 करोड़ लोगों की ओर से तरफ से उन्होंने ट्रंप को धन्यवाद भी कहा। इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि इस तरह से देश को बेचने को फायदेमंद बताया गया हो और एक असमान सौदे को इतने गुलामी भरे एहसान के साथ स्वीकार गया हो। इतनी बड़ी असर वाली किसी सौदेबाजी की घोषणा पहली बार सोशल मीडिया के जरिए की गई है और संसद या राज्यों के साथ बिना किसी विचार-विमर्श के गुप्त तरीके से की गई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जिन देशों ने लंबे साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों के बाद अपनी आज़ादी हासिल की हैं, उन्हें ऐसे कई अनुभव हुए हैं, जहाँ उपनिवेशवादी शासन ने सीधे उनके अधिकारों और घरेलू खेती के साथ-साथ उद्योगों को बचाने या बढ़ावा देने की उनकी क्षमता को रोककर रखा था। खेती की जान-बूझकर उपेक्षा, निःऔद्योगीकरण के साथ उपनिवेशवादी लूट, संसाधनों की बर्बादी और विनिर्मित सामानों की डंपिंग हुई, जिसमें अक्सर सैन्य ताकत का भी हाथ होता था। पहले के जमाने में देशों पर गुलामी और उनके बाजारों तक बिना रोक-टोक पहुंच के कारण संबंधित देशों के लोग उनके सामानों के ग्राहक बन जाते थे। अब यह जमाना एक अलग रूप में वापस आ रहा है। आज फ़र्क यह है कि भाजपा-आरएसएस की अगुवाई वाली राजग सरकार जिस भारतीय शासक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, वह बिना रोक-टोक के बाजार तक पहुँच, बिना रोक-टोक के मुनाफ़े और भारत के करोड़ों किसानों की ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी की बिल्कुल भी चिंता न करने के वादे के साथ साम्राज्यवाद के लिए लाल गलीचा बिछा रही है। अगर उस समय उपनिवेशवादी शासन आर्थिक गिरावट के लिए सीधे ज़िम्मेदार था, तो अब असमान व्यापार सौदा भी वैसा ही असर डालेंगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारतीय किसानों की ज़िंदगी गिरवी रखने वाला असमान सौदा</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत-अमेरिका व्यापार पर अंतरिम रूपरेखा समझौता से पहले इंग्लैड और यूरोपियन यूनियन के साथ दूसरे कई असमान मुफ्त व्यापार समझौते हुए हैं और इसके बाद ऐसे कई समझौते और होंगे। यूरोपियन यूनियन के बजट का सबसे बड़ा आबंटन साझा कृषि कार्यक्रम के लिए आबंटन है &#8212; यह 2014 और 2020 के बीच कुल खर्च का लगभग 38 प्रतिशत था, जो कुल 408.31 अरब यूरो (43.8 लाख करोड़ रूपये) था ; 2021 से 2027 के लिए यह रकम लगभग 387 अरब यूरो (41.5 लाख करोड़ रूपये) या कुल बजट का 31 प्रतिशत तय है। भारत में हाल के संघीय बजट में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों के लिए 1.37 लाख करोड़ रूपये या बजट का सिर्फ़ 2.7 प्रतिशत आबंटित किया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">2026 में खेती के कार्यक्रमों के लिए अमेरिकी संघीय सरकार द्वारा लगभग 18.65 लाख किसानों को 44.3 अरब डॉलर (4,02,132 करोड़ रूपये) का भुगतान करने का अनुमान है। इसका मतलब है कि हर व्यक्ति को 23,753 डॉलर या लगभग 21,56,000 रूपये की सब्सिडी मिलेगी। भारत में खेती की सब्सिडी लगभग 57.5 अरब डॉलर (लगभग 5 लाख करोड़ रूपये) है और यहाँ लगभग 14.6 करोड़ किसान हैं। एक भारतीय किसान के लिए यह सब्सिडी लगभग 373 डॉलर या लगभग 34,000 रुपए होगी। अमेरिका में खेत का औसत आकार 469 एकड़ है, जबकि 2000 एकड़ से ज़्यादा के खेत कुल खेती की ज़मीन का 61 प्रतिशत है। अमेरिका में 3,50,000 डॉलर या लगभग 3.18 करोड़ रूपये से कम की नगद आय करने वाले किसानों को छोटाबकिशन माना जाता है और इतनी आय वाले “छोटे खेत” सभी खेतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। भारत में खेतों का औसत आकार लगभग 2.67 एकड़ है और 86 प्रतिशत लोगों के पास 5 एकड़ से कम ज़मीन है, और सरकार के दावों को यदि सच माना जाएं, तो वे 1,64,000 रूपये या लगभग 1807 डॉलर से कम कमाते हैं। तेज़ी से कम होती सरकारी मदद के साथ खराब हालात में जी रहे गरीब भारतीय किसान को अमेरिका के बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले अमीर किसानों और कृषि-व्यापार के साथ सीधे मुकाबले में खड़ा होना पड़ेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका-भारत संयुक्त बयान किसानों के इस सबसे बुरे डर की पुष्टि करता है कि भाजपा-राजग सरकार ने भारत के किसानों की ज़िंदगी और रोजी-रोटी को गिरवी रख दिया है। इसने एक बार फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद और घरेलू एकाधिकार के आगे अपनी पूरी गुलामी दिखाई है। यह तब है, जब पहले का भी अनुभव है कि भारत-श्रीलंका मुक्त व्यापार समझौता और भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते का भारतीय किसानों, खासकर रबर, चाय, कॉफी, काली मिर्च और दूसरे मसाला उत्पादक किसानों पर बुरा असर पड़ा है। शुल्क-मुक्त आयात की वजह से कीमतें गिर गईं थीं और खासकर केरल राज्य में कई किसानों ने आत्महत्या कर ली थीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहले ही, 2024-25 (अक्टूबर से सितंबर) के समय भारत का कपास आयात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर, 41.3 लाख गांठ तक पहुंच गया है। भारत का सबसे बड़ा कपास निर्यातक अब अमेरिका बन गया है, जिसने 2023-24 और 2024-25 के बीच 8,56,000 गांठों का निर्यात किया है, जो 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। इसके ठीक बाद ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया का नंबर आता है, जिन्होंने क्रमशः 8,54,000 और 8,49,000 गांठों का निर्यात किया है। ट्रंप के टैरिफ युद्ध के दबाव में आकर, आयात में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, केंद्र सरकार ने 2025-26 में कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क में छूट देने का ऐलान किया, जिससे अमेरिका से आयात में 95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका से कच्चे कपास का लगातार आयात भारतीय किसानों के लिए कीमतों में और गिरावट लाएगा और संकट से जूझ रहे, आत्महत्या करने वाले कपास किसानों के खेतों में कर्ज़ बढ़ेगा और किसानों की आत्महत्याएं भी बढ़ेंगी। जब संयुक्त किसान मोर्चा के एक प्रतिनिधिमंडल ने महाराष्ट्र के आत्महत्या के लिए अभिशप्त विदर्भ इलाके का दौरा किया, तो हमने देखा कि कपास के साथ-साथ सोयाबीन की कीमतों में भी भारी गिरावट आई है, जो एक और ऐसी फसल है, जिसका भारत को निर्यात करने के लिए अमेरिका बहुत उत्सुक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भाजपा-राजग सरकार के इरादे साफ कर दिए हैं। उन्होंने कहा है कि, “भारत के पास अमेरिका से कच्चा कपास खरीदने की सुविधा है, तो उससे तैयार कपड़ा उत्पादों का निर्यात शून्य प्रतिशत पारस्परिक शुल्क पर स्वीकार किया जाएगा”, और “जब भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार अंतरिम समझौता को अंतिम रूप दे दिया जाएगा, तो भारत को बांग्लादेश को दी गई छूट की तरह ही लाभ मिलेगा”। इससे यह झूठ पूरी तरह से सामने आ जाता है कि “खेती अमेरिकी व्यापार समझौते के दायरे से बाहर है” और “प्रधानमंत्री किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेंगे।&#8221; सरकार साफ़ तौर पर भारतीय उद्योगपतियों को अमेरिका से कपास आयात करने के लिए बढ़ावा देकर शासक वर्ग के हितों को आगे बढ़ा रही है। यह तर्क कि किसानों के हितों का नुकसान नहीं होगा, क्योंकि कुल अमेरिकी निर्यात काफ़ी सीमित है, और अगर भारत पूरी तरह से आयात शुल्क हटा भी देता है, तो भी घरेलू कपास की खपत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, पूरी तरह से गलत है। यह इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि बढ़े हुए आयात का घरेलू कपास की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा &#8212; ठीक वैसे ही जैसे भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता के बाद केरल में रबर किसान तबाह हो गए थे। बिना रोक-टोक वाले वैश्विक प्रतिस्पर्धा के सामने, भारतीय कपास किसान अमेरिका के भारी सब्सिडी और आधुनिक प्रौद्योगिकी वाले कपास उत्पादकों के साथ मुकाबला नहीं कर पाएंगे। यह याद रखना चाहिए कि भारत में चल रहे कृषि संकट के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों में से बहुत ज़्यादा संख्या महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे कपास उगाने वाले इलाकों से आती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पीयूष गोयल ने किसानों को गुमराह करने के लिए झूठ और धोखे का सहारा लिया है। उन्होंने यह दावा किया है कि खेती के क्षेत्र में अमेरिका को कोई छूट नहीं दी गई है, जबकि भारत-अमेरिका संयुक्त घोषणा का पहला पैराग्राफ ही कुछ और कहता है। इस समझौते से असल में, बड़े अमेरिकन कृषि व्यापारियों के और अमेरिकन किसानों के सस्ते, बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले उत्पाद भारतीय बाजार में भर जाएंगे, जिससे कीमतें गिर जाएंगी। इस घोषणा में कहा गया है : “भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक सामान और अमेरिका के कई तरह के खाने और खेती के उत्पाद पर शुल्क खत्म कर देगा या कम कर देगा, जिसमें सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन, जानवरों के चारे के लिए लाल ज्वार, मेवा, ताज़े और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट, और दूसरे उत्पाद शामिल हैं।” यह किसी के भी अनुमान पर छोड़ दिया गया है कि “दूसरे उत्पाद” में क्या-क्या शामिल होगा। भारत के अनाज किसानों के लिए खतरनाक बात यह है कि इस बारे में कोई साफ बयान नहीं है कि अनाज पर शुल्क सुरक्षा बरकरार रखा जाएगा। इसका मतलब हो सकता है कि भारत का कृषि बाजार अमेरिका के शिकारी कृषि व्यापारियों के लिए पूरी तरह से खोल दिया जाएगा। ऐसी कोई भी घटना किसानों की रोज़ी-रोटी को खतरे में डाल देगी और भारत की खाद्य सुरक्षा से भी समझौता होगा। इसका नतीजा यह होगा कि ‘निवाले के लिए जहाज (शिप टू माउथ)&#8217; वाले दिन वापस आ जाएँगे और पीएल-480 जैसी बेइज़्ज़ती वाली योजनाओं पर निर्भरता बढ़ जाएगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत ने अगले पांच सालों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने का भी वादा किया है, जिसका मतलब है कि इस एग्रीमेंट के तहत उसे हर साल 100 अरब डॉलर की खरीदारी करनी होगी। अमेरिका इस सौदेबाजी का इस्तेमाल भारत के साथ व्यापार घाटे को कम करने के लिए कर रहा है और उसने भारत पर इस तरह के असमान समझौते के लिए दबाव डाला है। पीयूष गोयल इस बात से भी आसानी से बच निकलते हैं कि जहां भारत के निर्यात पर शुरू में लगभग 2.5% से कम अमेरिकी टैरिफ लगाया जाता था, वहीं बाद में अमेरिका ने एकतरफा तौर पर इन करों को 25% और कुछ सामानों पर 50% तक बढ़ा दिया, और अब इसे 18% पर ला दिया है, जो मूल टैरिफ से लगभग सात गुना ज़्यादा है। एक ओर जहां भाजपा-आरएसएस बहुत ज़्यादा जोश में हैं और पूरी तरह से आत्मसमर्पण का जश्न मना रहे हैं, वहीं अमेरिका के कृषि सचिव, ब्रुक रोलिंस ने ज़ोर देकर कहा है कि यह समझौता “भारत के बड़े बाजार में ज़्यादा अमेरिकी कृषि उत्पाद का निर्यात करने, कीमतें बढ़ाने और ग्रामीण अमेरिका में नगद लाने में मदद करेगी”। भले ही चीन, ब्राज़ील और दूसरे देश ट्रंप के ज़बरदस्ती वाले टैरिफ़ के आगे झुकने से मना कर रहे हैं, लेकिन संघ परिवार, जो साम्राज्यवाद के साथ सहयोग करने की अपनी विरासत पर कायम है, ने एक बार फिर भारत के लोगों को धोखा दिया है। यह समझौता ट्रंप के &#8216;अमेरिका को फिर से महान बनाने&#8217; (मागा) की योजना को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ये असमान व्यापार समझौता वही काम करने जा रही हैं, जो 3 कृषि कानून नहीं कर पाए। इसका नतीजा यह होगा कि किसान कंगाल हो जाएंगे और उन्हें बेदखल कर दिया जाएगा। उन्हें मुश्किल हालात में शहरों में जाकर, पूंजीपतियों के इशारे पर, एक ऐसे माहौल में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जहां मजदूरों के अधिकारों की कोई बात नहीं होगी। अगर हम इनका विरोध नहीं करेंगे, तो गुलामी की जंजीरें हमारा इंतज़ार कर रही हैं। लाखों किसानों के लिए यह “करो या मरो” का पल है। इन असमान व्यापार समझौते के खिलाफ 12 फरवरी को पूरे भारत में लोग सड़कों पर उतर आए थे। सीपीआई(एम) और वामपंथ के साथ-साथ लोकतांत्रिक पार्टियां, वर्गीय संगठनों और जन संगठनों के साथ-साथ मेहनतकश लोगों की मुद्दों पर आधारित एकता – संयुक्त किसान मोर्चा, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और कृषि और ग्रामीण मजदूरों के मंच &#8212; ने भी सही मायने में एक मज़बूत संघर्ष विकसित करने और इन कदमों का विरोध करने का फैसला किया है। इस समझौते के खिलाफ सबसे बड़ी एकता बनाई जाएगी और 24 मार्च के दिल्ली चलो अभियान को व्यापक रूप से सफल बनाने के लिए पूरी ताकत लगाई जाएगी।</p>
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		<title>एआई समिट का गलगोटिया कांड : बीजेपी-मोदी के भारत में झूठ का पर्दाफाश</title>
		<link>https://suryodaybharat.com/ai-summits-galgotias-scandal-lies-exposed-in-bjp-modis-india/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 09:34:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="381" height="464" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-25-at-02.32.31.jpeg" alt="" class="wp-image-307372" style="width:840px;height:auto" srcset="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-25-at-02.32.31.jpeg 381w, https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-25-at-02.32.31-246x300.jpeg 246w" sizes="auto, (max-width: 381px) 100vw, 381px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अपूर्वानंद : </strong>दिल्ली में लगे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मेले में गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा एक चीनी रोबोट को अपना ‘आविष्कार’ बतलाकर प्रदर्शित किए जाने के बाद से देश और विदेश में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की खिल्ली उड़ रही है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी के साथ ही भारत भी हँसी का पात्र बन गया है। गलगोटिया के झूठ का पर्दाफाश हो जाने के बाद उसे धक्के देकर मेले से निकाल दिया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोग पूछ रहे हैं कि आखिर इतने प्रतिष्ठित आयोजन में, जिसमें प्रधानमंत्री की छवि दाँव पर लगी हो, इस तरह की धोखाधड़ी कैसे हो पाई? यह कहना इसलिए ज़रूरी है कि अब भारत में कुछ भी अब भारत के लिए नहीं होता, प्रधानमंत्री के लिए होता है। वह चाहे जी-20 का सम्मेलन हो या कोई खेल प्रतियोगिता या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का यह मेला। भारत में इसलिए ये सारे आयोजन नरेंद्र मोदी के कारण हो पा रहे हैं। वरना भारत को कौन पूछता था?</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत में अब जो कुछ होता है, वह नरेंद्र मोदी के प्रताप से होता है और उन्हीं के लिए किया जाता है। इसलिए, मामला भारत की छवि का जितना नहीं, उतना नरेंद्र मोदी की छवि का है। गलगोटिया की घटना कुछ वैसी ही है, जैसे कोई झकाझक कुर्ता पहन कर निकले और कोई उस पर कीचड़ डाल दे। गलोगोटिया को सज़ा इसके लिए दी गई कि उसने प्रधानमंत्री की छवि ख़राब की, इसलिए नहीं कि उसने धोखाधड़ी की। फिर यह सवाल भी है कि आख़िर गलगोटिया ने यह धोखाधड़ी कैसे की? धोखाधड़ी का तो एकमात्र अधिकार इस देश के प्रधानमंत्री का है और इस सरकार का है!</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसने गलगोटिया यूनिवर्सिटी की अर्हता की जाँच की थी और मेले में शामिल होने के लिए उसे इजाज़त दी थी? यूनिवर्सिटी के दावे की पोल खुलने के पहले भारत सरकार के मंत्री ने ख़ुद उसके इसी ‘आविष्कार’ की सार्वजनिक रूप से तारीफ़ भी की थी। मंत्री महोदय क्या बिना जाँच के किसी के भी दावे पर अपनी मुहर लगा देते हैं?</p>



<p class="wp-block-paragraph">मंत्री या सरकार से यह अपेक्षा लेकिन ग़लत है। आख़िरकार इस मंत्री के नेता, यानी प्रधानमंत्री देशवासियों को कह चुके हैं कि नाले की गैस से वे चाय बना सकते हैं या पकौड़े तल सकते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया था कि कौरवों का जन्म इस बात का प्रमाण है कि प्राचीनकाल में भारत में स्टेम सेल की जानकारी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि गणेश के धड़ पर हाथी का सर इस बात का सबूत है कि इस ब्रह्मांड का पहला अंग-प्रत्यारोपण भारत में हुआ था। जब देश का प्रधानमंत्री इस तरह की बेपर की उड़ा सकता है तो गलगोटिया ने क्या क़सूर किया है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने झूठा दावा किया। क्या हम इस वजह से उससे ख़फ़ा हैं? पिछले 12 साल से प्रधानमंत्री एक के बाद एक झूठ बोलते जा रहे हैं। हमें कोई उज्र नहीं, बल्कि उनके झूठ को उनकी मजबूरी बतलाया जाता है। बेचारे क्या करें, अगर झूठ न बोलें! चुनाव के वक्त जनता को अपनी तरफ़ गोलबंद करने के लिए झूठ बोलना पड़ता है, बाद में जनता में सकारात्मक भाव भरने के लिए उन्हें झूठ बोलना पड़ता है। हमें समझाया जाता है कि इरादा उनका नेक है, और वह है देश का गौरव गान करना और लोगों में उत्साह भरना, इसलिए हमें उनके शब्दों पर नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनके इरादे की तारीफ़ करनी चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने भी झूठ पकड़े जाने पर यही कहा कि उसकी ज़ुबान ज़रा फिसल गई थी या सुनने वालों की समझ का फेर था कि उसे ग़लत समझा गया। इरादा उसका नेक था। यूनिवर्सिटी ने कहा कि वह देश के लिए एक धरोहर है और इस एक ग़लतफ़हमी के चलते उसके सारे काम पर पानी नहीं फेरा जाना चाहिए। वह देश के युवाओं के लिए एक उदाहरण पेश कर रही है और इस तरह की आलोचना से उसका मनोबल टूटता है।<br>इस विवाद के बाद मैंने एक विद्यार्थी को विश्वविद्यालय के पक्ष में बोलते सुना। उसका कहना था कि बातचीत ग़लत दिशा में हो रही है, यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों को इस रोबोट के ज़रिए सिर्फ़ यह बतला रही थी कि क्या-क्या किया जा सकता है। एक विद्यार्थी ने यह भी कहा कि उनके विश्वविद्यालय की मान्यता समाप्त करने की बात क्यों की जा रही है, पहले जेएनयू की मान्यता रद्द करनी चाहिए, क्योंकि वहाँ देशद्रोही रहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गलगोटिया के विद्यार्थियों को बात करते देख याद आया कि अभी कुछ समय पहले इसी संस्थान के विद्यार्थी राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने जंतर-मंतर आए थे। उनसे जब पूछा गया कि वे क्यों राहुल गाँधी का विरोध कर रहे हैं, तो उनके पास कोई जवाब न था। उन्हें प्रशासन ने कहा था, इसलिए वे चले आए। शायद इसी वजह से यह ढिठाई गलगोटिया के प्रशासन और विद्यार्थियों में दिखलाई पड़ती है कि वे शर्मिंदा होने की जगह सीनाज़ोरी करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने भी झूठ के वातावरण में साँस लेना सीख लिया है। नोटबंदी हो या कोरोना में 4 घंटे की नोटिस पर लॉकडाउन या ऑपरेशन सिंदूर, हर मामले में सरकार के झूठ के पक्ष में हमने भारत की जनता के एक हिस्से को दलील देते सुना है। जनता कहती है, बुद्धिजीवी कहते हैं, मीडिया कहता है कि हमें प्रधानमंत्री की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए। वे अच्छी नीयत से झूठ बोलते हैं।<br>गलगोटिया यूनिवर्सिटी इस झूठ की संस्कृति का सिर्फ़ एक, भले ही निर्लज्ज उदाहरण है। हमें अधिक चिंता इसलिए है कि वह शिक्षा संस्थान है। लेकिन यह मात्र एक शिक्षा संस्थान का मसला नहीं है। उच्च शिक्षा पर निगाह रखनेवाले महेश्वर पेरी ने लिखा कि यह तो गलगोटिया ने वही किया, जो यह व्यवस्था उसे कहने को कहती है। उन्होंने लिखा कि यह पूरी व्यवस्था तभी आपको पुरस्कृत करती है, जब आप दिखला सकें कि आपकी रैंकिंग कितनी ऊपर है, “स्वायत्तता, क्रमिक स्वायत्तता, नए परिसरों, नए पाठ्यक्रमों की शुरुआत, और ऑनलाइन डिग्रियाँ देने की अनुमति &#8212; सब कुछ को रैंकिंग से जोड़ दिया गया है।” सरकारी स्तर पर स्पष्ट आदेश यह है कि क्यू एस रैंकिंग में जगह बनानी है, ताकि भारत हर वर्ष बड़े दावे कर सके। रैंकिंग घोषित होने पर स्वयं प्रधानमंत्री भी ट्वीट करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेरी कहते हैं कि जब संस्थानों को कहा जाए कि उन्हें नए पाठ्यक्रम, नए परिसर, ऑनलाइन पाठ्यक्रम की इजाज़त मिल जाएगी, अगर वे यह दिखला सकें कि उनको ‘नैक’ ने 3.26 अंक दिया है या वे एनआईआरएफ़ की रैंकिंग में पहले 100 संस्थानों में शामिल हैं। इसके लिए उन्हें झूठे दावे करने ही हैं। शोध निबंध के प्रकाशन, शोध की संख्या, पेटेंट आदि के बारे में संस्थान झूठे आँकड़े पेश कर रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेरी के मुताबिक़ हमें तभी चेत जाना चाहिए था, जब हमने देखा कि सभी आईआईटी मिलकर भी उतना शोध नहीं कर रहे हैं, जितना कुछ निजी विश्वविद्यालय अपने-अपने स्तर पर कर रहे हैं। उसी समय हमें शोध की गुणवत्ता पर प्रश्न उठाना चाहिए था। यह देखकर हमें ताज्जुब नहीं हुआ कि टीएचआई रैंकिंग में इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस का शोध स्कोर 51.6 है, जबकि पाँच निजी विश्वविद्यालयों का स्कोर 90 से अधिक है।पेटेंट आवेदनों की संख्या बढ़ती जा रही है, जबकि स्वीकृत पेटेंटों की संख्या कभी नहीं बढ़ी। चार निजी विश्वविद्यालय ऐसे थे, जो अलग-अलग, सभी आईआईटी को मिलाकर किए गए पेटेंट आवेदनों से भी अधिक आवेदन कर रहे थे।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">दुनिया भर में उच्च शिक्षा पर केंद्रित पत्रिकाएँ लिख रही हैं कि भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान रैंकिंग प्रणाली के साथ खेल कर रहे हैं, कि भारत में शोध-अपराध बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिक सहकर्मी-समीक्षा प्रणाली के साथ खेल कर रहे हैं और प्रकाशित शोध पत्र वापस लिए जा रहे हैं क्योंकि वे जाली हैं। पेटेंट दाखिल करने की होड़ मची है, जबकि उनमें से शायद ही किसी पेटेंट का वास्तविक व्यावसायिक मूल्य है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेरी कहते हैं कि असल बात यह है कि सरकार यह दिखलाना चाहती है कि उसने उच्च शिक्षा में युवा जनसंख्या के 50% को दाखिल कर लिया है। यह तभी हो सकता है, जब हम सरकारी आँकड़ों की जाँच करना बंद दें, शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल करना बंद दें। इन झूठे और जाली आँकड़ों के सहारे शिक्षा संस्थानों को ऑनलाइन डिग्री देने की छूट दी जाएगी और डिग्री देनेवाले कारख़ानों को बढ़ावा दिया जाएगा। इस तरह सरकार दावा कर पाएगी कि उसने 50% दाख़िले का लक्ष्य पूरा कर लिया है। झूठ बोलकर यह यूनिवर्सिटी सरकार से पुरस्कार भी ले चुकी है। यह वही सरकार है, जिसने जिओ विश्वविद्यालय को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एक्सलेंस का तमग़ा तब दे दिया था, जब वह पैदा भी नहीं हुआ था। सरकार ने दलील यह दी थी कि यह श्रेष्ठता की संभावना देखते हुए किया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम सब इस झूठ को क्यों बर्दाश्त कर रहे हैं? क्योंकि हम एक बड़े झूठ को पसंद करते हैं। वह बड़ा झूठ प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी पिछले कई दशकों से बोल रही है। भारत में मुसलमान हिंदुओं का हक़ छीन रहे हैं, हिंदुओं का जनसंख्या कम हो रही है, मुसलमान हिंदू औरतों को साज़िशन मुसलमान बना रहे हैं, भारत में घुसपैठिए भर गए हैं, ईसाई हिंदुओं का धर्मांतरण कर रहे हैं, भारत के विश्वविद्यालयों में राष्ट्रविरोधी तत्त्व छिपे हुए हैं, संस्कृत सारी भाषाओं की जननी है, भारत विश्वगुरु था : इन सारे झूठों पर हम यक़ीन करना चाहते हैं, इसलिए गलगोटिया के झूठ को हमें बर्दाश्त करना होगा। ज़रा गहराई से हम विचार करें तो हमें मालूम होगा कि मुसलमान और ईसाई विरोधी घृणा ही गलगोटिया जैसे झूठ को सहने या नज़रअंदाज़ करने के लिए हमें बाध्य करती है।</p>
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		<title>भागवत महान और उनका हिंदुत्व महान : विष्णु नागर</title>
		<link>https://suryodaybharat.com/bhagwat-is-great-and-his-hindutva-is-great-vishnu-nagar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 09:29:40 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[अन्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में सवर्ण, पिछड़ा तथा दलित समाज के प्रतिनिधियों के साथ गोरखपुर में सामूहिक भोज किया। बहुत बड़ा पुण्य कार्य किया! आजकल इतना बड़ा और इतना साहसिक कदम इस देश में कौन उठाता है! मगर उनकी हिम्मत देखिए, उन्होंने यह कर दिखाया!! इस बात पर तालियां बजनी चाहिए!!! &#8230;</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="957" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-23-at-09.14.21-1024x957.jpeg" alt="" class="wp-image-307368" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>: </strong>आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में सवर्ण, पिछड़ा तथा दलित समाज के प्रतिनिधियों के साथ गोरखपुर में सामूहिक भोज किया। बहुत बड़ा पुण्य कार्य किया! आजकल इतना बड़ा और इतना साहसिक कदम इस देश में कौन उठाता है! मगर उनकी हिम्मत देखिए, उन्होंने यह कर दिखाया!! इस बात पर तालियां बजनी चाहिए!!!</p>



<p class="wp-block-paragraph">तालियां अगर बज चुकी हों, तो हम आगे बढ़ें। भागवत जी ने सब आमंत्रितों की सबसे पहले उनकी जाति से उनकी पहचान की होगी! उन्हें किसी का धर्म जानने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि सब उनकी तरह के &#8216;हिंदू &#8216; थे! यूं तो वे मुसलमानों को भी अपने भाषणों में &#8216;हिंदू&#8217; बताते हैं।उनके अनुसार भारत भूमि में जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है।सबका डीएनए एक है, मगर उन्होंने इन वाले &#8216;हिंदुओं&#8217; को भोज पर नहीं बुलाया! उन्होंने सिखों और बौद्धों को भी नहीं बुलाया! जब मुसलमान उनके लिए हिंदू हो सकते हैं, तो ये तो उनसे डबल-ट्रिपल हिंदू हैं, मगर ये सब भाषण करने और इंटरव्यू देने के लिए &#8216;हिंदू&#8217; हैं, बाकी क्या हैं, आप समझते हैं!</p>



<p class="wp-block-paragraph">भोजन से पहले भागवत जी को बताया गया होगा कि ये शर्मा जी या मिश्रा जी हैं, ये अग्रवाल साहब हैं या गुप्ता जी हैं, ये सिंह साहब हैं या राजपूत साहब हैं। ये सब सवर्ण हैं, इतना तो भागवत जी जानते ही हैं! जहां तक दलितों की बात है, महामानव जी ने एक बार मुसलमानों के बारे में ज्ञान दिया था कि उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है, उसी फार्मूले से दलितों को भागवत जी ने उनके कपड़ों से ही पहचान लिया होगा! महामानव जी का यह फार्मूला इतना सीधा और सरल है कि चार साल के बच्चे को भी इसका ज्ञान करवा दिया जाए, तो वह सड़क चलते दलितों और मुसलमानों को भी &#8216;पहचान&#8217; लेगा! वैसे महामानव जी की भी असली पहचान उनके पल-पल बदलते कपड़े हैं!</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह तो नहीं पता कि भोजन के लिए किस-किस जाति के कितने-कितने प्रतिनिधि बुलाए गये थे और किसे, कहां बैठाया गया था! हो सकता है कि सारे सवर्ण एक साथ बैठाए गए हों। संभव यह भी है कि सवर्णों को भी वर्ण व्यवस्था के क्रम से बैठाया गया हो, ताकि सबकी पहचान सुरक्षित रहे, किसी तरह का उनमें घालमेल न हो! आजकल ऐसी गड़बड़ियां काफी होने लगी हैं।अंत:धार्मिक ही नहीं, अंतर्जातीय विवाह भी अब बहुत होने लगे हैं। इस कारण हिंदू वर्ण-व्यवस्था खतरे में पड़ गई है! ऐसे लड़के-लड़कियों की कभी-कभार हत्या कर दी जाती है और कभी-कभी उन्हें आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया जाता है, फिर भी यह सिलसिला थमता नहीं!</p>



<p class="wp-block-paragraph">भोजन की इस व्यवस्था के कारण भागवत जी के लिए हरेक की जाति पहचानना आसान रहा होगा! शर्मा जी को सिंह साहब समझने की गलती उनसे नहीं हुई होगी!इस तरह इन जातिवीरों की &#8216;भावनाएं &#8216;सुरक्षित रही होंगी ! आजकल हिंदुओं का एक वर्ग बेहद &#8216;भावना-प्रधान&#8217; हो चुका है! और इन भावनाओं का एकमात्र काम भड़कना है। इन भावनाओं की भड़कने से रक्षा करना इक्कीसवीं सदी के चौथाई भाग में इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि लोग अपनी बेटी तक की जान ले लेते हैं!</p>



<p class="wp-block-paragraph">भोजन के दौरान संभव है कि भागवत जी ने यह पूछा हो कि कहिए, शर्मा जी, भोजन तो आपको ठीक लगा न! आप ब्राह्मणों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शाकाहारी भोजन बनवाया गया है। रसोइया भी ब्राह्मण ही है, ताकि आपका धर्म भ्रष्ट न हो! प्याज़-लहसुन को हमारे यहां तामसिक माना गया है, इसलिए उनका भी उपयोग नहीं किया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और गुप्ता जी, आपको तो यह सादा भोजन शायद ही रुचा हो! इसमें केवल दो ही मिठाइयां हैं! इससे आपको कहां संतोष होनेवाला! और सिंह साहब, शाकाहारी भोजन तो आपको क्या ही पसंद आया होगा, इसके लिए मैं आपसे अब क्षमा ही मांग सकता हूं। फिर हंसकर कहा होगा कि सच्चे हिंदुओं की संगत में आदमी कष्ट भी आराम से झेल लेता है! फिर उन्होंने शायद यह भी बताया हो कि &#8216;हिंदू एकता&#8217; के लिए उनके स्वयंसेवकों ने पिछले सौ वर्षों में न जाने कितनी तरह के कितने कष्ट भोगे हैं! परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने यह नहीं कहा होगा कि इन कष्टों में वैसे एक कष्ट दलितों के साथ भोजन करना भी है!</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने वाल्मीकि जी से भी पूछा होगा कि भोजन तो रुचिकर है न! इसके आगे यह कहने से उन्होंने स्वयं को रोका होगा कि आप लोगों को ऐसा भोजन तो यदा- कदा ही मिलता होगा!आप संघ से जुड़े रहिए, जब कभी हम समरसता भोज का आयोजन करेंगे, आपको अवश्य आमंत्रित करेंगे!</p>



<p class="wp-block-paragraph">मित्रों, उस भोज का यह विवरण काल्पनिक है, मगर उतना काल्पनिक भी नहीं है! कुछ वास्तविक आधार है इसका! संघ और भाजपा के नेता दलितों के घर भोजन करने का ड्रामा बहुत समय से कर रहे हैं। एक बार कर्नाटक के इनके एक बड़े नेता ने किसी आला होटल से अपने और अपने भक्तों के लिए बढ़िया-सा नाश्ता मंगवाया और उसे दलित की झोपड़ी में ग्रहण किया, क्योंकि उस समय दलित-दलित खेलने का भाजपा-संघ का कार्यक्रम जोरों से चल रहा था!</p>



<p class="wp-block-paragraph">दलित पति-पत्नी इनके चरणों में बैठे इन्हें मुग्धभाव से इन्हें खाते हुए देखते रहे और ये गपागप खाते रहे! संघ की समरसता इससे आगे जा भी नहीं सकती! नाश्ता चूंकि किसी ऊंची होटल से आया था, तो इसे दलित परिवार के सदस्यों के साथ साझा करना अनुचित होता, क्योंकि इससे उनकी आदत बिगड़ जाती! इससे &#8216;सामाजिक समरसता&#8217; अभियान खतरे में पड़ जाता!</p>



<p class="wp-block-paragraph">नेता जी ने भक्षण किया, फोटो खिंचवाया और बड़ी-सी गाड़ी में फुर्र हो गए! खाने के बाद की लंबी डकार भी नेताजी ने शायद वहीं ली होगी और इतनी जोरदार रही होगी कि पूरा झोपड़ा हिल गया होगा। मगर टीवी के न्यूज़ चैनल वाले और अखबार वाले इस तरह की जरूरी बातें नहीं बताते! बताते तो यह खबर इतनी धांसू बन सकती थी कि किसी-किसी कन्नड़ अखबार में तो यह उस दिन की पहली खबर होती!</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसी तरह भाजपा के दिल्लीवासी एक उड़िया सांसद जी का मन भी एक आदिवासी के यहां भोजन करने का हुआ! चुनाव के समय नेताओं के मन में अकसर क्रांतिकारी भाव पैदा हो जाते हैं! उन्होंने बढ़िया सी लिपी-पुती झोपड़ी में जमीन पर बैठकर पांच-छह तरह के सुस्वादु व्यंजनों का अकेले-अकेले स्वाद लिया। जिस आदिवासी के यहां वह भोजन कर रहे थे, उसके परिवार के लोगों की तरफ उनकी पीठ थी! उस आदिवासी परिवार की तीन बच्चियां और दो बूढ़ी औरतें बड़ी हसरत से उस भोजन और उस सांसद का भकोसन कार्यक्रम देखती रहीं, मगर सांसद जी को इससे अंतर नहीं पड़ा!उनकी भूख, सुस्वादु भोजन की उनकी लालसा को जानने-समझने की उन्हें न फुरसत थी, न इच्छा! उन्हें तो राजनीतिक पाइंट स्कोर करना था! उन्होंने फोटो खिंचवा लिया था, उसे वायरल करवा दिया था। बन चुका था उनका काम! जीहो गया था, जयश्री राम!</p>



<p class="wp-block-paragraph">तो दलित या आदिवासी के घर खाने का नाटक तो ये बढ़िया ढंग से कर लेते हैं, उसकी खबर भी ढंग से छपवा लेते हैं, टीवी पर दिखवा भी लेते हैं, मगर जब किसी दलित लड़की को किसी आंगनबाड़ी में रसोईये का काम मिल जाता है, तो छूआछूत के मारे इस समाज के लोग तीन महीने तक अपने बच्चों को वहां नहीं भेजते, ताकि इस भोजन से उनकी जाति भ्रष्ट न हो ! ऐसे समय सामाजिक समरसता के ये सिपाही न जाने कहां छूमंतर हो जाते हैं! जब कहीं दलित लड़के से थूक चटवाया जाता है, उसके कपड़े उतारकर उसके साथ कुकर्म करने की कोशिश की जाती है, वहां भी समरसतावादी दूर-दूर तक नज़र नहीं आते! कोई दलित लड़का ग़लती से तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के घर में चला जाता है और उसे इतना प्रताड़ित दी जाती है कि वह आत्महत्या कर लेता है, तब भी हिंदू एकता के हिमायती किसी बिल में घुसे पाए जाते हैं! दलितों में इन्हें हिंदू के दर्शन नहीं होते! उस समय वे किसी मस्जिद के आगे डीजे बजा रहे होते हैं या भगवा फहरा रहे होते हैं या हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे होते हैं! जब किसी दलित लड़के को मूत पिलाया जाता है, तो ये गली-गली में हिंदू सम्मेलन करने में व्यस्त रहते हैं। सड़कों पर गुंडागर्दी करने के लिए हर मोड़ पर बजरंग दल वाले मिल जाएंगे, मगर जहां कोई दलित-आदिवासी पिट रहा होगा, उसे घसीटा जा रहा होगा, मार खिलाई जा रही होगी, उसका घर तोड़ा जा रहा होगा या उसके जंगल कटवाए जा रहे होंगे, वहां हिंदुत्व के ये &#8216;वीर सपूत&#8217; महाराणा प्रताप और शिवाजी के वंशज न जाने कहां छुपे होते हैं कि अंतरिक्ष में लगी दूरबीन से भी दिखाई नहीं देते! जब दिल्ली में एक लड़की दलितों का मज़ाक़ बनाते हुए उनसे कह रही थी कि पांच हजार साल से तुमने पानी नहीं पिया होगा, आओ मैं तुम्हें पानी पिला दूं तो एक भगवा भी उस मुंहजोर को जवाब देने आगे नहीं आया! ऐसा &#8216;महान&#8217; है यह हिंदुत्व, जिसके सौ साल का उत्सव आजकल जोर और शोर से मनाया जा रहा है!</p>
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		<title>&#8216;ब्यूरोक्रेट्स इंडिया&#8217; द्वारा जारी ‘टॉप 25 चेंजमेकर्स 2025’ सूची में पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव भी शामिल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 02:45:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[अन्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सूर्योदय भारत समाचार सेवा : सिविल सेवाएं शासन की रीढ़ बनी रहती है, जो नीतियों को धरातल पर लागू करती है और यह सुनिश्चित करती है कि विकास का लाभ प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे। अपने समर्पण और प्रशासनिक नेतृत्व के माध्यम से अधिकारी संस्थाओं को सशक्त बनाने, सेवा वितरण में सुधार लाने तथा जमीनी स्तर &#8230;</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="768" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-27-at-20.22.54-1-1024x768.jpeg" alt="" class="wp-image-307312" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">सूर्योदय भारत समाचार सेवा : सिविल सेवाएं शासन की रीढ़ बनी रहती है, जो नीतियों को धरातल पर लागू करती है और यह सुनिश्चित करती है कि विकास का लाभ प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे। अपने समर्पण और प्रशासनिक नेतृत्व के माध्यम से अधिकारी संस्थाओं को सशक्त बनाने, सेवा वितरण में सुधार लाने तथा जमीनी स्तर पर सार्थक परिवर्तन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी क्रम में &#8216;ब्यूरोक्रेट्स इंडिया&#8217; द्वारा वर्ष 2025 के लिए अखिल भारतीय स्तर पर जारी “टॉप 25 चेंजमेकर्स” सूची में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ व जौनपुर जनपद निवासी, नवोदय विद्यालय, आज़मगढ़ एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरा छात्र एवं भारतीय डाक सेवा के वर्ष 2001 बैच के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव का नाम भी शामिल किया गया है। यह सम्मान उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, नवाचार और लोकसेवा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है। इस सूची में विदेश सचिव, विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक सहित आईएएस,आईपीएस, आईएफएस व केंद्रीय सिविल सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="948" height="488" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-27-at-20.22.54.jpeg" alt="" class="wp-image-307313" srcset="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-27-at-20.22.54.jpeg 948w, https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-27-at-20.22.54-300x154.jpeg 300w, https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-27-at-20.22.54-768x395.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 948px) 100vw, 948px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">इंडिया पोस्ट में दो दशकों से अधिक की सेवा के दौरान कृष्ण कुमार यादव ने तकनीक-आधारित एवं नागरिक-केंद्रित पहलों के माध्यम से अंतिम छोर तक सुशासन को आधुनिक रूप प्रदान करने में अहम् भूमिका निभाई है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी सहित सूरत, अंडमान एवं निकोबार, जोधपुर और अहमदाबाद में सेवाएँ देते हुए उन्होंने प्रशासनिक दक्षता और डिजिटल सेवा वितरण को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ कृष्ण कुमार यादव एक प्रख्यात साहित्यकार, लेखक, कवि और ब्लॉगर भी हैं। सामाजिक एवं समकालीन विषयों पर उनका सक्रिय लेखन लोकसेवा को साहित्यिक अभिव्यक्ति और जनसंवाद से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाल ही में उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल रूप में कृष्ण कुमार यादव ने गुजरात के प्रथम जेन-ज़ी थीम आधारित डाकघर का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर में शुभारंभ का नेतृत्व किया, जो केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया के उस दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिसके अंतर्गत डाकघरों को युवा-केंद्रित और तकनीक-सक्षम केंद्रों में परिवर्तित किया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समावेशी शासन को सुदृढ़ करने से लेकर सार्वजनिक सेवा वितरण में प्रौद्योगिकी के प्रभावी एवं नवाचारपूर्ण उपयोग तक, पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने नागरिकों के जीवन में सकारात्मक एवं स्थायी परिवर्तन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में जन-केंद्रित पहलों को नई दिशा मिली है, जिससे सेवा वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी, सुलभ एवं प्रभावी बनी है। उनकी प्रशासनिक कार्यशैली उत्कृष्टता, दृढ़ संकल्प तथा भारत की प्रगति के प्रति साझा प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है।</p>
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		<title>पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; : डॉ. अतुल मलिकराम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Suryoday Bharat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 02:35:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[अन्य प्रदेश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सूर्योदय भारत समाचार सेवा : आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://suryodaybharat.com/carbon-credit-is-a-big-opportunity-for-indias-development-beyond-environment-dr-atul-malikram/">पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; : डॉ. अतुल मलिकराम</a> appeared first on <a href="https://suryodaybharat.com">Suryoday Bharat</a>.</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://suryodaybharat.com/wp-content/uploads/2026/02/WhatsApp-Image-2026-02-25-at-16.24.07-1-1024x576.jpeg" alt="" class="wp-image-307306" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सूर्योदय भारत समाचार सेवा : </strong>आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह है क्या? और इसका हमसे क्या संबंध है? सरल शब्दों में समझें तो कार्बन क्रेडिट एक तरह का प्रमाण-पत्र है। जब कोई देश, कंपनी या परियोजना वातावरण में जाने वाले कार्बन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषण को एक टन कम करती है, तो उसे एक कार्बन क्रेडिट मिलता है। इस व्यवस्था की शुरुआत 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल से हुई और 2015 के पेरिस समझौते के बाद यह और व्यापक हो गई। इसका मूल सिद्धांत सीधा है जो प्रदूषण कम करे, उसे आर्थिक लाभ मिले; जो ज्यादा प्रदूषण करे, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़े।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज यह केवल पर्यावरण की चर्चा नहीं रह गई है, बल्कि एक वैश्विक बाजार बन चुका है। दुनिया के कई देश अपने व्यापार नियमों में बदलाव कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ ने &#8216;कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट&#8217; जैसी व्यवस्था लागू करनी शुरू की है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी देश में उत्पादन के दौरान अधिक प्रदूषण होता है, तो उसके उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। आने वाले समय में भारतीय उद्योगों को भी यह साबित करना होगा कि उनका उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यहाँ से कार्बन क्रेडिट का आर्थिक और राजनीतिक महत्व शुरू होता है। भारत लंबे समय से यह कहता आया है कि ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों ने सबसे अधिक प्रदूषण किया है, इसलिए विकासशील देशों पर समान बोझ डालना न्यायसंगत नहीं है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था &#8216;ग्रीन&#8217; यानी पर्यावरण-अनुकूल दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में भारत के लिए कार्बन क्रेडिट को अवसर के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सबसे पहले बात करें किसानों की। खेती जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होती है, लेकिन यही क्षेत्र नई आय का स्रोत भी बन सकता है। यदि किसान ड्रिप सिंचाई अपनाते हैं, फसल अवशेष नहीं जलाते, जैविक खाद का उपयोग बढ़ाते हैं, मिट्टी में कार्बन सुरक्षित रखने वाली पद्धतियाँ अपनाते हैं या सोलर पंप लगाते हैं तो वे कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं। इससे उनकी आय केवल फसल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के बदले अतिरिक्त कमाई भी होगी। सही नीति और पारदर्शी व्यवस्था हो तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा बड़ा क्षेत्र एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग है। यह क्षेत्र देश के रोजगार और निर्यात की रीढ़ है। यदि छोटे उद्योग ऊर्जा-कुशल मशीनें अपनाएँ, सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग करें और उत्पादन प्रक्रिया में प्रदूषण कम करें, तो उन्हें दोहरा लाभ मिलेगा, एक तरफ ऊर्जा लागत घटेगी, दूसरी तरफ कार्बन क्रेडिट के रूप में अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा। आज वैश्विक खरीदार भी &#8216;ग्रीन सप्लाई चेन&#8217; को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में भारतीय उद्योगों के लिए यह प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का व्यावहारिक मार्ग है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरे स्तर पर सरकारों की भूमिका अहम है। भारत के विभिन्न राज्यों के पास अलग-अलग प्राकृतिक संसाधन हैं, कहीं घने जंगल, कहीं तेज हवाएँ तो कहीं सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। यदि राज्य अपने संसाधनों के आधार पर कार्बन परियोजनाएँ विकसित करें, तो वे राजस्व का नया स्रोत बना सकते हैं। केंद्र सरकार के लिए एक पारदर्शी और मजबूत राष्ट्रीय कार्बन बाजार विकसित करना रणनीतिक रूप से आवश्यक है। इससे भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करते हुए वैश्विक कार्बन फाइनेंस में महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कॉर्पोरेट क्षेत्र और निवेशकों के लिए भी यह एक बड़ा अवसर है। दुनिया भर में ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक जिम्मेदारी और सुशासन) आधारित निवेश तेजी से बढ़ रहा है। जो कंपनियाँ अपने उत्सर्जन कम करती हैं और कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करती हैं, वे निवेशकों की पहली पसंद बन रही हैं। यह केवल छवि सुधारने का साधन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता की रणनीति है। युवा पीढ़ी के लिए भी यह क्षेत्र नए अवसर खोल रहा है। कार्बन अकाउंटिंग, पर्यावरण ऑडिट, सस्टेनेबिलिटी सलाहकार, कार्बन बाजार विश्लेषण जैसे पेशे आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेंगे। टेक्नोलॉजी आधारित स्टार्टअप भी इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत की स्थिति इस संदर्भ में मजबूत है। हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में कम है। हमारे पास सौर ऊर्जा की अपार क्षमता, विस्तृत वन क्षेत्र और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। यदि इन संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो कार्बन क्रेडिट के माध्यम से गांवों में वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेरिस समझौते के तहत भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से 500 गीगावाट ऊर्जा क्षमता और उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं होगा। इसके लिए उद्योग, किसान, निवेशक और आम नागरिक, सभी की भागीदारी आवश्यक है। स्पष्ट है कि कार्बन क्रेडिट केवल पर्यावरण का विषय नहीं है। यह भविष्य की अर्थव्यवस्था, व्यापार नीति और राष्ट्रीय रणनीति से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि भारत इसे दूरदर्शिता, पारदर्शिता और संतुलित नीति के साथ अपनाता है, तो यह हमारे लिए बाध्यता नहीं बल्कि विकास का नया अध्याय बन सकता है।</p>
<p>The post <a href="https://suryodaybharat.com/carbon-credit-is-a-big-opportunity-for-indias-development-beyond-environment-dr-atul-malikram/">पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर &#8216;कार्बन क्रेडिट&#8217; : डॉ. अतुल मलिकराम</a> appeared first on <a href="https://suryodaybharat.com">Suryoday Bharat</a>.</p>
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