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Book Review ‘रिफ़्यूजी कैंप’: छः साल की बच्ची के सवाल से जन्मी यह कहानी कश्मीरियत को बताती है: आशीष कौल

साक्षात्कार / लखनऊ : हाल ही में पाठकों के बीच आई प्रभात प्रकाशन  की  नई किताब,‘रिफ़्यूजी कैंप’ चर्चा का विषय बनी हुई है । कहा जा रहा है कि ये किताब पिछले घटनाक्रमों पर समझ पैदा करते हुए कश्मीर के आने वाले कल को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाती है। पढ़ने वाले कहते हैं ये उम्मीदों की कहानी है । लेखक की ये पहली रचना है और पहली ही रचना पर खास तौर पर युवा पाठकों के बीच होने वाली चर्चाएँ इसे खास बना देती है। रिफ़्यूजी कैंप पर लेखक आशीष कौल से हुई बातचीत के अंश प्रस्तुत हैं –

 आशीष जी सबसे पहले अपनी किताब रिफ़्यूजी कैंप के बारे में बताएं ?

‘रिफ़्यूजी कैंप, इस किताब का जन्म मेरी छह साल की  बच्ची के उस सवाल से हुआ है  कि जिसने मुझे  चिंता में डाल दिया।उसने मुझसे पूछा ,‘अगर हम कश्मीरी हैं और  कश्मीर वाकई इतना सुंदर है, तो हम वहाँ क्यूँ नहीं रहते?मेरे पास तब कोई जवाब नहीं था । आज छह साल बाद मेरी ये किताब उस बच्ची और हर बूढ़े जवान सबके सवालों का जवाब है कि हम आखिर वहाँ से क्यूँ निकाले गए और हम क्यूँ वापिस नहीं जा पा रहे  और कैसे जा पाएंगे ?हजारों साल पहले महाभारत में अभिमन्यु ने  अपनी जान देकर एक चक्रव्युह भेदा था जो अपने आप में भय का प्रतीक था । तब भी कोई अपनी ज़मीन वापिस चाहता था और आज भी लाखों लोग अपने कश्मीर लौटना चाहते हैं।  आज कश्मीर में भी वैसे ही आतंक  का चक्रव्यूह है और एक अभिमन्यु की दरकार भी । ये किताब हम सब में छुपे उसी अभिमन्यु को जगाने का एक प्रयास है । ये किताब  एक कोशिश है धर्म जाति से ऊपर उठ आतंक के खिलाफ एक लड़ाई के लिए लोगों में अभिमन्यु को जगाने की ताकि सब बैठकर किसी करिश्मे का इंतज़ार करने की बजाए खुद आतंक  के खिलाफ खड़े हों ।आप जब कहते हैं कि ये किताब हज़ार साल पुराने इतिहास से परिचित कराती है तो कौन से इतिहास की बात कर रहे हैं आप ?

कश्मीर में आतंकवाद की शुरुआत करीब ग्यारहवीं शताब्दी में हुई जब पहली बार क्रूसेड़ से निकले मुस्लिम आक्रांताओं ने कश्मीर में घुसपैठ की । और तब से शुरुआत हुई खूनी दौर की जिसमें वहाँ के तत्कालीन बहुसंख्यक सनातनी हिंदुओं को कल्पना से परे  ऐसे ऐसे तरीकों से शोषित किया गया कि जिस से न सिर्फ उनका धर्म परिवर्तन हुआ बल्कि उनके उसके खान पान , कपड़े पहनने के तरीके रीति रिवाजों में  भी बदलाव आ गया । बचे हुए हिंदुओं में आप आज जो रीति रिवाज खान पान , पहनने ओढ़ने के तरीके देखते हैं वो उस दमनकारी दौर की ही तो देन है । लेकिन ये हमारे पुरखों का बढप्पन रहा कि उन्होने कभी मुसलमानों से घृणा करना नहीं सिखाया । उनका ये विश्वास था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और भय से मुस्लिम बने हिन्दू वापिस हिन्दू बन जाएंगे । इसलिए हमें हमारे बड़ों ने विरासत में दिया तो प्रेम और सद्भाव ।

 

आपने कहा कि आज जो कश्मीरी पंडितों का रहन सहन है , पहनावा और खानपान है वो मुस्लिम दमनकारी दौर की देन है । ये कैसे?

बिलकुल ये उसी दौर की झलक है । प्रताड़णा इसलिए होती थी कि ताकि धर्म परिवर्तन हो जाये । जो नहीं झुकते थे वो दंडित होते थे।शुरू  जो अडिग रहे वो मारे गए । बाकी बचे लोगों ने कॉम्प्रोमाइज़ कर लिया । आज की संस्कृति उसी कॉम्प्रोमाइज़ का रेफ़्लेक्शन है ।

आपने इस किताब में उन 48 घंटों का ज़िक्र खास तौर पर किया है जब कश्मीरी पंडितों को विवश होकर वादी छोडनी पड़ी । क्या कुछ खास है ?

कुछ खास नहीं, सिर्फ इतना कि हर शाम हिन्दू घरों पर पत्थरबाजी , रोज़ रात लाउड स्पीकर्स  से गूँजती धमकियाँ कि  या धर्म बदलो, या भाग जाओ या दर्दनाक मौत के लिए तैयार हो जाओ और विशिष्ट हिन्दू व्यक्तियों को दिन दहाड़े , सरे आम गोलियों से भून देना। न पुलिस , न फौज न सरकार । कोई नहीं था । सब हमको  भेड़ बकरियों की तरह सड़कों पर मरने के लिए छोड़ गए।   बस इतना ही तो हुआ था। और वो 48 घंटे सरकारें और लोग बहुत आराम से भुला चुके  हैं। न न्यूज़ मीडिया था और न सशक्त सरकार। मैं इस किताब के जरिये उन 48 घंटों को कहानी का स्वरूप देकर डॉकयुमेंट कर रहा हूँ।

आप 24 साल से मीडिया में तरह तरह के उच्च पदों पर आसीन रहे । मार्केटिंग, ब्रांडिंग और स्ट्रेटजी के बंदे हैं। आपके सोचने और बोलने का माध्यम अंग्रेजी रही है। फिर पहली ही किताब हिन्दी में कहने का जोखिम क्यूँ उठाया ?

देखिये मेरी भाषा कश्मीरी हो , अंग्रेजी हो या कुछ और , मुझे ये बहुत क्लियर है कि देश की भाषा  ,उत्तर भारतीय राज्यों की भाषा हिन्दी है । मैं अपनी बात वादियों से मैदानों तक पहुंचाना चाहता था। मैं चाहता था कि कश्मीर का मामला क्यूँ नहीं सुलझ रहा ? उसका इतिहास और समाधान हर उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसको हिंदुस्तानी होने में फख्र महसूस होता है । हिन्दी से बेहतर ये सब किसी एक  भाषा  से संभव नहीं था । युवाओं को ध्यान में रखते हुए ये बहुत सरल हिंदुस्तानी (हिन्दी, उर्दू अङ्ग्रेज़ी मिलीजुली)में लिखी कहानी है।

आपके हिसाब से अगर जख्म इतने पुराने हैं तो फिर शांति होगी कैसे?

करीब करीब ये ही सवाल हजारों साल पहले अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा था। अपनों को मारने के बाद कैसी शांति?ठीक उसी तरह रेफ़्यूजी कैंपमें ये ही सवाल अभिमन्यु के सामने  भी था । क्या उसे भी वो ही करना चाहिए था जो उसके साथ हुआ था?हज़ार साल के खूनी इतिहास के बाद भी अलग अलग धर्म के कश्मीरियों ने एक दूसरे के साथ रहना सीख लिया था । कश्मीर की परवाह एक कश्मीरी के अलावा किसी को नहीं है । इसलिए मेरा विश्वास है किकश्मीरी समाज ही इकट्ठा होकर अपने सामाजिक ताने बाने को मजबूत कर के  शांति ला सकता  है। अभिमन्यु ने भी ऐसा ही एक रास्ता चुना। मेरा मानना है कि कोई सरकार या आर्मी कभी शांति नहीं ला  सकते। पहल तो एक आम कश्मीरी को ही करनी होगी। इस पहल के लिए किसी न किसी को कुर्बानी देनी पड़ेगी । महाभारत में कुर्बानी अभिमन्यु ने दी थी अब भी पहल हम सबके भीतर सोये हुए अभिमन्यु को जगाकर करनी होगी। इसलिए ही मैं कहता हूँ कि ‘अभिमन्यु अभी ज़िंदा  है’। वो मरा नहीं है, उसे अपने भीतर जगाने की ज़रूरत है।

रिफ़्यूजी कैंप का अभिमन्यु कौन है?

अभिमन्यु हर वो इंसान है  जिसे रिफ़्यूजी कैंप के कवर पर दिये गए पाँच सिद्धांतों – शांति , मानवता  , धर्म , स्वाभिमान , न्याय पर विश्वास है । अभिमन्यु  होना सरल नहीं है। हर युग में इन सिद्धांतों को बचाए रखने के लिए उसे  अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ती है। अभिमन्यु हर उस हिंदुस्तानी की आवाज़ है जो ये चीख चीखकर हर सरकार से  कहता कि बस अब बहुत हो गया । अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो इस देश का युवा सक्षम है अपनी समस्याओं का समाधान खोज निकालने को।

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