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सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा मामले में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला, पूरी मेरिट नहीं तो भर्ती नहीं

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) स्कूलों में सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा मामले में दायर एमसीडी की याचिका को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भर्ती एजेंसी को सभी पद भरने के लिए मेरिट पूरी नहीं कर पा रहे अभ्यर्थियों की भी भर्ती के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही एमसीडी को राहत देते हुए कहा कि उसे भर्ती के लिए न्यूनतम पात्रता अंक निर्धारित करने का अधिकार था।  मामले में एमसीडी के लिए दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) ने 2348 सहायक शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन जारी किया था, लेकिन 1638 का ही परिणाम जारी हुआ।

परीक्षा से पूर्व कहा था कि बोर्ड को न्यूनतम पात्रता अंक निर्धारित करने का अधिकार होगा। लिखित परीक्षा में किसी अभ्यर्थी ने कितने अंक अर्जित किए, यह खुलासा नहीं किया जाएगा। परिणाम आने के बाद कुछ अभ्यर्थियों ने इन शर्तों को मनमानीपूर्ण बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। वह खारिज हो गई। अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट की पीठ के समक्ष मामला रखा, जहां याचिका स्वीकार की गई। इस पर एमसीडी ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली।

अभ्यर्थियों ने लगाया मनमानी का आरोप
अभ्यर्थियों की ओर से तर्क दिया गया कि बोर्ड को केवल परीक्षा करवानी थी, उसे न्यूनतम पात्रता अंक तय करने का अधिकार नहीं था। न्यूनतम पात्रता अंक जाहिर न करना मनमानी और भेदभावपूर्ण है। निर्धारित 2348 की जगह 1638 अभ्यर्थियों का ही परिणाम जारी किया गया, जबकि 2004 के कुलदीप सिंह बनाम बोर्ड मामले में कोर्ट कहा चुका है कि सभी वर्गों के पदों को पात्र अभ्यर्थियों से सामान्य प्रक्रिया के भरा जाना चाहिए। ऐसे में बोर्ड को बाकी अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति देने के निर्देश दिए जाने चाहिए।

एमसीडी ने दी कोर्ट में सफाई
एमसीडी का तर्क था कि भर्ती प्रक्रिया की सभी शर्तें नीतिगत निर्णय हैं। बोर्ड ने यह शर्तें एमसीडी की ओर से तय की हैं, ऐसे में याची के तर्क को नहीं माना जा सकता। मनमानी और भेदभाव का आरोप गलत है क्योंकि यह शर्तें सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से लागू हुई हैं। जस्टिस आर बानुमति और जस्टिस एएस बोपन्ना ने एमसीडी का तर्क माना कि बोर्ड का गठन पात्र अभ्यर्थियों के चयन के लिए हुआ है, वह पात्रता की शर्तें तय कर सकता है। अगर अभ्यर्थियों में से किसी के चयन के आदेश अगर दिए गए तो यह नियुक्ति दे रहे संस्था के योग्य अभ्यर्थी के चुनाव के अधिकार में हस्तक्षेप होगा।

बोर्ड द्वारा तय की गई शर्तें सभी अभ्यर्थियों के लिए समान हैं, इसलिए यह भेदभावपूर्ण भी नहीं हैं। कम संख्या में परिणाम जारी करने के अभ्यर्थियों के तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बोर्ड द्वारा तय की गई मेरिट के बाद एमसीडी से इस बात के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती कि ऐसे अभ्यर्थियों के नियुक्ति के लिए मेरिट घटाए जो पद के अपेक्षित समझ नहीं रखते। बचे हुए अभ्यर्थियों के नियुक्ति का आदेश बाकी अभ्यर्थियों के प्रति अन्याय होगा, जो परीक्षा प्रक्रिया में शामिल हुए और बेहतर अंक लाकर नियुक्त हुए।दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) स्कूलों में सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा मामले में दायर एमसीडी की याचिका को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भर्ती एजेंसी को सभी पद भरने के लिए मेरिट पूरी नहीं कर पा रहे अभ्यर्थियों की भी भर्ती के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

साथ ही एमसीडी को राहत देते हुए कहा कि उसे भर्ती के लिए न्यूनतम पात्रता अंक निर्धारित करने का अधिकार था। मामले में एमसीडी के लिए दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) ने 2348 सहायक शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन जारी किया था, लेकिन 1638 का ही परिणाम जारी हुआ। परीक्षा से पूर्व कहा था कि बोर्ड को न्यूनतम पात्रता अंक निर्धारित करने का अधिकार होगा। लिखित परीक्षा में किसी अभ्यर्थी ने कितने अंक अर्जित किए, यह खुलासा नहीं किया जाएगा। परिणाम आने के बाद कुछ अभ्यर्थियों ने इन शर्तों को मनमानीपूर्ण बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। वह खारिज हो गई। अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट की पीठ के समक्ष मामला रखा, जहां याचिका स्वीकार की गई। इस पर एमसीडी ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली।

भ्यर्थियों ने लगाया मनमानी का आरोप
अभ्यर्थियों की ओर से तर्क दिया गया कि बोर्ड को केवल परीक्षा करवानी थी, उसे न्यूनतम पात्रता अंक तय करने का अधिकार नहीं था। न्यूनतम पात्रता अंक जाहिर न करना मनमानी और भेदभावपूर्ण है। निर्धारित 2348 की जगह 1638 अभ्यर्थियों का ही परिणाम जारी किया गया, जबकि 2004 के कुलदीप सिंह बनाम बोर्ड मामले में कोर्ट कहा चुका है कि सभी वर्गों के पदों को पात्र अभ्यर्थियों से सामान्य प्रक्रिया के भरा जाना चाहिए। ऐसे में बोर्ड को बाकी अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति देने के निर्देश दिए जाने चाहिए।

एमसीडी ने दी कोर्ट में सफाई
एमसीडी का तर्क था कि भर्ती प्रक्रिया की सभी शर्तें नीतिगत निर्णय हैं। बोर्ड ने यह शर्तें एमसीडी की ओर से तय की हैं, ऐसे में याची के तर्क को नहीं माना जा सकता। मनमानी और भेदभाव का आरोप गलत है क्योंकि यह शर्तें सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से लागू हुई हैं। जस्टिस आर बानुमति और जस्टिस एएस बोपन्ना ने एमसीडी का तर्क माना कि बोर्ड का गठन पात्र अभ्यर्थियों के चयन के लिए हुआ है, वह पात्रता की शर्तें तय कर सकता है। अगर अभ्यर्थियों में से किसी के चयन के आदेश अगर दिए गए तो यह नियुक्ति दे रहे संस्था के योग्य अभ्यर्थी के चुनाव के अधिकार में हस्तक्षेप होगा।

बोर्ड द्वारा तय की गई शर्तें सभी अभ्यर्थियों के लिए समान हैं, इसलिए यह भेदभावपूर्ण भी नहीं हैं। कम संख्या में परिणाम जारी करने के अभ्यर्थियों के तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बोर्ड द्वारा तय की गई मेरिट के बाद एमसीडी से इस बात के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती कि ऐसे अभ्यर्थियों के नियुक्ति के लिए मेरिट घटाए जो पद के अपेक्षित समझ नहीं रखते। बचे हुए अभ्यर्थियों के नियुक्ति का आदेश बाकी अभ्यर्थियों के प्रति अन्याय होगा, जो परीक्षा प्रक्रिया में शामिल हुए और बेहतर अंक लाकर नियुक्त हुए।

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