नई दिल्ली: वर्षों से गृहयुद्ध मार झेल रहे सीरिया के पुर्ननिर्माण के लिए राष्ट्रपति बशर अल असद ने जो एक विवादित फैसला लिया था अब उसकी मियाद खत्म होने को है। इस फैसले के तहत सीरिया के लोगों को अपनी संपत्ति के दस्तावेज 30 दिन के भीतर पेश करने को कहा गया है।
प्राप्त खबरों के अनुसार ऐसे में जो लोग इस समय अवधि में अपने प्रॉपर्टी के कागजात सरकार के समक्ष मुहैया नहीं करवा सकेंगे उनकी संपत्ति को सीज कर लिया जाएगा। असद के फैसले का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ने वाला है जो लोग गृहयुद्ध की मार से बचने के लिए देश छोड़कर दूसरी जगहों पर बस चुके हैं। ऐसे में इन लोगों की वापसी का भी रास्ता बंद हो सकता है। इसके शिकार सरकार समर्थक भी होंगे। आपको बता दें कि तरह के नियमों को पहले इजरायल और लेबनान भी अपने यहां पर लागू कर चुके हैं।
प्रॉपर्टी सीज करने वाले नए नियम को डिक्री नंबर 10 का नाम दिया गया है। यह आदेश चार अप्रैल को जारी किया गया था। 4 मई को इसकी मियाद पूरी होने वाली है। आपको बता दें कि जर्मनी में ही सिर्फ पांच लाख सीरियाई नागरिक रह रहे हैं। इसके अलावा भी दूसरे देशों में इन नागरिकों ने शरण ले रखी है। इस वक्त 60 लाख सीरियाई नागरिक बतौर रजिस्टर्ड रिफ्यूजी विदेशों में रह रहे हैं। हालांकि इनकी अनुमानित संख्या करीब एक करोड़ तक हो सकती है।
वहीं दूसरी तरफ यूरोपीयन यूनियन का मानना है कि करीब डेढ़ मिलियन सीरियाई शरणार्थी सिर्फ यूरोप में ही हैं। इसके अलावा 35 मिलियन शरणार्थी तुर्की और करीब दस मिलियन लेबनान में भी मौजूद हैं। असद के इस फैसले की तीखी निंदा हो रही है। जानकारों का मानना है कि असद संपत्ति जब्त कर उसे कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए अपने वफादार समर्थकों में बाटंना चाहते हैं और इसके जरिए वह अपना खजाना भरना चाहते हैं।
इन जानकारों का मानना है कि इस फैसले के जरिए विदेशों में रह रहे सीरियाई नागरिकों की संपत्ति जब्त होगी, वो भी भविष्य में सीरिया लौटने के कतराएंगे। जर्मनी ने खुलेतौर पर असद के इस फैसले की आलोचना की है। जर्मनी ने संयुक्त राष्ट्र और असद के सहयोगी रूस से इस आदेश को रद करवाने की मांग की है।