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बाढ़ में बिहार है ….. नीतिश कुमार हैं !

  • सतीश साह

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में लेख के शीर्षक से मिलता-जुलता ही चुनावी नारे बनाये गये थे। पिछले 15 वर्षों से नीतिश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में बिहार प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, किंतु लॉ एण्ड ऑर्डर में आंशिक सुधार के अलावा इनके कार्यकाल की और कोई बड़ी उपलब्धि दिखती नहीं हैं । कोरोना की वैश्विक महामारी को झेल रहा बिहार एक बार फिर से बाढ़ की चपेट में है। वैसे तो बिहार में हर साल बाढ़ का कहर प्रदेशवासियों के लिये एक अभिशाप से कम नहीं है। सरकार के द्वारा हर साल बेहतर इंतजामों का दावा किया जाता है किंतु बाढ़ हर साल घर, मकान, दुकान, मवेशियों के साथ ही सरकार के सभी इंतजामों और दावों को भी बहा ले जाती है। 
पिछले दिनों बिहार के गोपालगंज जिले में 270 करोड़ रूपये से निर्मित नये पुल को भी इस बाढ़ के कहर ने ढहा दिया। बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, खगड़िया, पूर्वी चम्पारण, शिवहर, समस्तीपुर, बेगुसराय है। क्या आपको पता है कि इन क्षेत्रों और जिलों का प्रतिनिधित्व कौन करता है ? पूर्व केन्द्रीय कृषि मंत्री और सांसद राधामोहन सिंह चम्पारण क्षेत्र से आते हैं, बेगुसराय से सांसद और केन्द्र में पशुपालन मंत्री गिरीराज सिंह। किंतु ऐसे मजबूत प्रतिनिधित्व के बावजूद भी इन बाढ़ प्रभावित जिलों की स्थिति बद से बदतर है। 
पिछले वर्ष भी बिहार में बाढ़ आफत बनकर आई थी। करीब 150 से अधिक प्रभावितों की मौत के साथ ही लगभग 2 करोड़ लोग इससे सीधे प्रभावित हुए। लाखों की संख्या में लोग बेघर हुए। उनके कीमती सामान, उनके मवेशी सब पानी में बहकर कही दूर निकल गये। 
विशेषज्ञ मानते है कि बिहार में बाढ़ आपदा नहीं बल्कि एक नेचुरल प्रोसेस है। पिछले साल बिहार की राजधानी पटना में भी इसी प्रकार के नेचुरल प्रोसेस का एक अदभुत और अनूठा दृश्य देखने को मिला था। प्रदेश की राजधानी का केवल बारिश के पानी से इतनी भयंकर तस्वीर प्रदेश और उसकी स्वर्णिम व्यवस्थाओं की पूरी कहानी बयां करती है। 
उत्तर बिहार का एक बड़ा हिस्सा हिमालय के करीब है और इसके कारण उन क्षेत्रों में बाढ़ पहले भी आती रही है किंतु समय के साथ जिन उपायों को सरकार के स्तर पर करना चाहिए था वो न हो सकी और इसके लिये सरकार का कुप्रबंधन ओर गलत नीतियाँ जिम्मेदार हैं। सरकारों ने नदियों के बहाव को रोकने के लिये बांधों का निर्माण तो कर दिया, लेकिन मिट्टी की परत बढ़ने और नदियों का जलस्तर बढ़ने से उत्पन्न भीषण बाढ़ कुप्रबंधन और पॉलिसी पैरालिसीज का ही नतीजा है। 
जहां एक ओर कोरोना से बिहार की लपटे कम होने का नाम नहीं ले रही, वहीं यह बाढ़ उन लपटों में घी का काम कर रही है। नीतिश कुमार चाहते तो पिछले 6 वर्षों से केन्द्र में एनडीए की सरकार है, एक विस्तृत एनालिसिस और अध्ययन के आधार पर एक रोडमैप बनाया जा सकता था। केन्द्र सरकार में शामिल बिहार के राजनेताओं के साथ समन्वय कर सभी एकजुटता के साथ केन्द्र से विशेष आर्थिक पैकेज को मांग कर सकते थे ताकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को हर साल के कहर और बदइंतजामी से बचाया जा सके। 
झारखण्ड के रूप में एक नये राज्य बनने के बाद बिहार केवल नदियों का प्रदेश बनकर रह गया है जिसमें अजय, कमला, कर्मनाशा, कोसी, गंगा, गण्डक, दुर्गावती, पुनपुन, बागमती, बूढ़ी गण्डक, सांचा और सोन जैसी नदियों का एक बड़ा संग्रह है बिहार के पास। इन बाढ़ प्रभावित जिलों में हर साल करदाताओं के खून-पसीने के हजारों-करोड़ों रूपये की लागत से बाढ़ से क्षतिग्रस्त पुल-पुलिया, सड़कों आदि का निर्माण किया जाता है और कुछ ही महीनों के बाद हिमालय की गोद से निकली लहरें उन सभी सरकारी इंतजामों को अपने साथ बहा ले जाती है। बाढ़ और कोरोना के बीच बिहार की आगामी विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ भी तेज हो गई हैं। नीतिश कुमार फिर से अपने तथाकथित सुशासन का राग अलापेंगे। विपक्ष उन पर कोरोना और बाढ़ की बदइंतजामी का आरोप लगायेंगे। फिर बड़े-बड़े राजनेता चुनावी रैलियों में मंच से बिहार और बिहारियों की अस्मिता की बोली लगायेंगे ।
सभी राजनैतिक पार्टियों का एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा। कहीं धर्म तो कहीं छद्म राष्ट्रवाद के गुलाल उड़ाये जायेंगे और जनता उस गुलाल से सराबोर होकर फिर कहेगी ‘‘ठीके तो है नीतिश कुमार’’।

(लेखक के निजी विचार हैं)

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